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हिमाचल के जंगल बचेंगे तो ही बचेगा जल और जीवन: आजीविका से जुड़कर रुकेगी वनाग्नि: धीरज रमौल, सचिव, प्रयास सोसाइटी

सिरमौर। हिमाचल प्रदेश में हर वर्ष बढ़ रही वनाग्नि की घटनाएं चिंता का विषय बनती जा रही हैं। इन घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए वनों को स्थानीय लोगों की आजीविका से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। यह बात प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने एक बयान में कही।

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के वन केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि जल स्रोतों, कृषि, पर्यटन और जैव विविधता की आधारशिला हैं। वनों के क्षरण से जलस्रोत सूख रहे हैं, जिससे पीने के पानी और सिंचाई पर गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है।

धीरज रमौल ने कहा,
जब तक हमारे वन सुरक्षित रहेंगे, तब तक हिमाचल का जल, पर्यावरण और भविष्य सुरक्षित रहेगा।

उन्होंने सुझाव दिया कि स्थानीय लोगों को वनों से जुड़े गैर-काष्ठ उत्पाद जैसे काफल, तिमूर, जड़ी-बूटियां, शहद आदि के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़ा जाए, ताकि उनकी आय में वृद्धि हो और वे वनों के संरक्षण के प्रति जागरूक बनें।

इसके अतिरिक्त, इको-टूरिज्म, होम-स्टे, ट्रैकिंग और प्रकृति आधारित पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देकर युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। इससे पलायन को रोकने में भी मदद मिलेगी।

उन्होंने वनाग्नि की रोकथाम के लिए आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर बल देते हुए कहा कि ड्रोन निगरानी, मोबाइल एप्लीकेशन और त्वरित सूचना प्रणाली के माध्यम से आग की घटनाओं पर समय रहते नियंत्रण पाया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय युवाओं को इन तकनीकों में प्रशिक्षित कर रोजगार से जोड़ा जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा के कारण हिमाचल के वन अधिक संवेदनशील हो गए हैं। ऐसे में वृक्षारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।

अंत में उन्होंने कहा,
वन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी की साझा धरोहर हैं। यदि हम मिलकर प्रयास करें, तो हिमाचल के जंगलों को बचाया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।

प्रयास सोसाइटी का संकल्प है कि समाज, सरकार और युवाओं के सहयोग से वनों की रक्षा, आजीविका सशक्तिकरण और पर्यावरण संतुलन को बढ़ावा दिया जाए।

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