"मेरा जनाज़ा वही शख्स पढ़ाएगा जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कोई 'हराम' काम न किया हो और जिसकी 'असर की सुन्नत' कभी कज़ा (छूट) न हुई हो।"कुतुब साहब,.
दिल्ली की फिजाओं में उस दिन गम का गहरा सन्नाटा था। कुतुब साहब, यानी ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर चुके थे। जनाजे का मजमा तैयार था, लेकिन सबकी नजरें उस वसीयत पर टिकी थीं जो अभी-अभी पढ़ी गई थी।
ख्वाजा साहब की वसीयत ने वहां मौजूद बड़े-बड़े ज़ाहिदों और आलिमों को हैरत में डाल दिया था। वसीयत की शर्त बड़ी सख्त और रूहानी थी:
"मेरा जनाज़ा वही शख्स पढ़ाएगा जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कोई 'हराम' काम न किया हो और जिसकी 'असर की सुन्नत' कभी कज़ा (छूट) न हुई हो।"
वसीयत के अल्फाज गूंजते ही मजमे पर एक खामोशी तारी हो गई। वक्त ठहर सा गया। हर शख्स अपने गिरेबान में झांकने लगा। लोग एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे, लेकिन किसी में इतनी जुर्रत न थी कि वह आगे बढ़कर इमामत का दावा करे। ऐसा लग रहा था कि शायद आज ख्वाजा साहब का जनाज़ा बिना नमाज़ के ही रह जाएगा।
तभी, सफों के बीच से एक शख्स सिसकियां भरता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ा। यह कोई मामूली इंसान नहीं, बल्कि सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश थे। उनकी आंखों से आंसू रवा थे और चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी थी। उन्होंने भरे गले से कहा:
"मैं नहीं चाहता था कि मेरा यह राज़ दुनिया के सामने आए। मैंने सालों से अपनी इन इबादतों को सिर्फ अपने रब और अपने बीच छुपा कर रखा था। लेकिन आज ख्वाजा साहब की मर्जी ने मुझे बेनकाब कर दिया।"
सुल्तान इल्तुतमिश ने भारी दिल के साथ मुसल्ले की तरफ कदम बढ़ाए। वह उस दौर के सबसे बड़े बादशाह तो थे ही, लेकिन उस दिन साबित हुआ कि वह रूहानियत के भी ऊंचे मकाम पर थे। दिल्ली के तख्त पर बैठने वाला वह सुल्तान ही वह वाहिद शख्स निकला, जिसने ता-उम्र न सिर्फ खुद को बुराइयों से दूर रखा, बल्कि असर की सुन्नतों जैसी नफली इबादत की भी हिफाज़त की।
Syed Afzal Ali Shah maududi