खेड़ा मामले में गिरफ्तारी पर टकराव, सिंहवी बोले ‘गिरफ्तारी की जरूरत नहीं’, एसजी ने मांगी कस्टोडियल जांच
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तीखी कानूनी बहस देखने को मिली। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंहवी, जो पवन खेड़ा की ओर से पेश हुए, ने अदालत में दलील दी कि यह मामला “अभूतपूर्व” है और इसमें गिरफ्तारी या कस्टोडियल पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरा मामला मानहानि (डिफेमेशन) से संबंधित है, जिसे कानूनी प्रक्रिया के तहत बिना गिरफ्तारी के भी प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है। सिंहवी ने यह भी आरोप लगाया कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा दिए गए कुछ सार्वजनिक बयान “अप्रिंटेबल” प्रकृति के हैं और यह संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि खेड़ा को लंबे समय तक जेल में रखने की धमकी दी गई, जो विधि के शासन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत है। वहीं, दूसरी ओर सॉलिसिटर जनरल (एसजी) ने खेड़ा की याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह मामला मात्र मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जालसाजी (फर्जी दस्तावेज) का गंभीर पहलू भी शामिल है। एसजी के अनुसार, खेड़ा द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित तौर पर फर्जी पासपोर्ट और विदेशी कंपनियों से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, जो जांच में नकली पाए गए हैं। उन्होंने अदालत से कहा कि मामले की गहराई से जांच के लिए कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक है, ताकि संभावित सह-अभियुक्तों और किसी विदेशी हस्तक्षेप की भूमिका का पता लगाया जा सके। एसजी ने यह भी आरोप लगाया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद से खेड़ा “फरार” रहे हैं और जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कोई साधारण मानहानि का मामला नहीं, बल्कि व्यापक साजिश और दस्तावेजों की जालसाजी से जुड़ा मामला है, जिसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह मामला 𝑺𝑳𝑷 (𝑪𝒓𝒊𝒎𝒊𝒏𝒂𝒍) 𝑵𝒐. 7786/2026 – पवन खेड़ा बनाम असम राज्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में आने वाला फैसला न केवल पवन खेड़ा की कानूनी स्थिति को प्रभावित करेगा, बल्कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी के मानकों को भी स्पष्ट दिशा दे सकता है। अब पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।