"जिंदा हैं शकीला,
पर सरकारी फाइलों ने मार डाला:
सिस्टम की कागजी क्रूरता का एक और उदाहरण"
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
शेरघाटी ( गया):
यह खबर किसी फिल्मी पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह हमारे प्रशासनिक तंत्र की उस कड़वी हकीकत को उजागर करती है जहाँ एक जीवित इंसान को अपनी सांसों का सबूत देने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
शेरघाटी के गढ़ मुहल्ला की निवासी शकीला खातून, जो पिछले छह महीनों से अपनी पेंशन के लिए भटक रही हैं, आज सरकारी रिकॉर्ड में 'मृत' घोषित की जा चुकी हैं।
मामले का मुख्य बिंदु:
रिपोर्ट के अनुसार, एक लिपिकीय त्रुटि (clerical error) के कारण शकीला खातून को मृत दिखा दिया गया,
जिसके परिणामस्वरूप उनकी वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई।
यह पेंशन ही उनके जीवन यापन का एकमात्र सहारा थी।
अब, वह अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर यह साबित करने की कोशिश कर रही हैं कि वह जीवित हैं।
प्रशासनिक विरोधाभास:
हैरानी की बात यह है कि विभाग के भीतर ही इस मामले को लेकर समन्वय की भारी कमी दिखती है। जहाँ एक ओर कार्यपालक सहायक का दावा है कि सुधार का प्रस्ताव फरवरी 2026 में ही भेजा जा चुका है,
वहीं प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) का कहना है कि उन्हें इस संबंध में कोई शिकायत ही नहीं मिली है।
यह विरोधाभास दर्शाता है कि निचले स्तर पर जवाबदेही की कितनी कमी है।
क्या हमारा सिस्टम इतना यंत्रवत हो गया है कि उसे एक बेसहारा बुजुर्ग की आंखों के आंसू और उसकी शारीरिक उपस्थिति नहीं दिखती?
डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहाँ हम 'ई-गवर्नेंस' की बात करते हैं, वहाँ एक वृद्ध महिला का छह महीने तक पेंशन के बिना रहना प्रशासनिक विफलता का चरम है।
यह केवल एक 'टाइपिंग मिस्टेक' नहीं है, बल्कि एक नागरिक के सम्मान के साथ जीने के अधिकार का हनन है।
जब कोई अधिकारी कहता है कि "हमें पता ही नहीं," तो वह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा होता है।
प्रशासन को चाहिए कि इस मामले में न केवल तत्काल पेंशन बहाल की जाए, बल्कि उन दोषियों पर भी कार्रवाई हो जिनकी लापरवाही ने एक बुजुर्ग को भूखे रहने की कगार पर खड़ा कर दिया।