सिंगरौली में रेत का 'काला साम्राज्य', खनिज अधिकारी और माफिया के गठजोड़ ने सिस्टम को किया खोखला!
सी न्यूज़ संवाददाता सिंगरौली | मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में रेत के अवैध कारोबार ने अब एक भयावह संगठित अपराध का रूप ले लिया है। यहाँ नियम और कायदे कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि धरातल पर सहकार ग्लोबल जैसी ठेका कंपनियों का नंगा नाच जारी है। ताज़ा हालातों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि शासन-प्रशासन के कान तक 'सिक्कों की खनक' इस कदर पहुँच चुकी है कि उन्हें नदियों का छलनी होता सीना दिखाई नहीं दे रहा।
सीमांकन का नामोनिशान नहीं: 5KM तक अवैध विस्तार।
नियमों के मुताबिक, हर रेत खदान का जीपीएस पिलर के माध्यम से स्पष्ट सीमांकन होना अनिवार्य है। लेकिन सिंगरौली में हकीकत इसके उलट है। सूत्रों की मानें तो स्वीकृत खदान क्षेत्र से 5 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक अवैध खनन का जाल फैला दिया गया है।
• राजस्व की चपत: शासन को मिलने वाले करोड़ों रुपये के राजस्व की खुलेआम चोरी की जा रही है।
• नियमों की धज्जियां: खदानों की कोई स्पष्ट बाउंड्री न होने से माफिया पूरी नदी को अपनी जागीर समझकर लूट रहा है।
मशीनों का आतंक: मजदूरों के पेट पर लात।
नियमों के अनुसार कई खदानों में केवल मैन्युअल खनन की अनुमति है, ताकि स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार मिल सके। लेकिन माफिया के रसूख के आगे लेबर कानून भी बौने साबित हो रहे हैं। यहाँ पोकलेन और जेसीबी जैसी भारी मशीनों का राज है। इससे न केवल स्थानीय मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है, बल्कि मशीनों के अनियंत्रित उपयोग से नदियों का जलस्तर तेजी से गिर रहा है और बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
"नदी का अस्तित्व खतरे में है। जिस गहराई तक मशीनें रेत निकाल रही हैं, उससे आने वाले समय में आसपास के गांवों में पीने के पानी का अकाल पड़ना तय है।" — स्थानीय ग्रामीण विशेषज्ञ
सवालों के घेरे में 'सिस्टम': खनिज अधिकारी की भूमिका पर गंभीर आरोप।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात जिला प्रशासन और खनिज विभाग की रहस्यमयी चुप्पी है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि *जिला खनिज अधिकारी आकांक्षा पटेल* की कथित मिलीभगत और संरक्षण के बिना इतना बड़ा घोटाला मुमकिन नहीं है।
• मिलीभगत का आरोप: आरोप है कि खनिज अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी ठेका कंपनी पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें अभयदान दे रही हैं।
• सवाल: क्या खनिज विभाग का काम केवल कागजी खानापूर्ति करना रह गया है? आखिर क्यों अब तक सहकार ग्लोबल जैसी कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए गए?
मोहन सरकार की साख दांव पर।
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार एक ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की बात करती है, तो दूसरी ओर सिंगरौली में रेत माफिया खुलेआम सरकार को चुनौती दे रहा है। जनता अब सीधे मुख्यमंत्री से सवाल पूछ रही है— "आखिर मोहन सरकार कब एक्शन मोड में आएगी?"
जनता का बढ़ता आक्रोश।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही अवैध खनन पर रोक नहीं लगाई गई और दोषी अधिकारियों व कंपनी पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे।
निष्कर्ष:
सिंगरौली में रेत का यह खेल केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है, बल्कि यह *ईमानदारी और जवाबदेही की हार* है। अब देखना यह है कि राजधानी भोपाल से क्या कोई कड़ा आदेश आता है, या फिर सिंगरौली की नदियों को इसी तरह माफिया के हवाले छोड़ दिया जाएगा।