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"खाकी और कानून के बीच 'फर्जी लाल बत्ती' का खेल" – बरेली का सनसनीखेज खुलासा, ​



विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

​बरेली से आई यह तस्वीर केवल तीन आरोपियों की नहीं, बल्कि समाज के उस कड़वे सच की है जहाँ सरकारी नौकरी की चाहत को ठगों ने अपना हथियार बना लिया है।
दो सगी बहनें—विप्रा और शिखा—जिन्होंने न केवल कानून की आंखों में धूल झोंकी, बल्कि दर्जनों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया।
खुद को आईएएस ट्रेनी और एडीएम बताकर इन बहनों ने एक ऐसा मायाजाल बुना, जिसमें पढ़े-लिखे बेरोजगार आसानी से फंस गए।

​धोखाधड़ी का 'सिस्टम':
कैसे बनाया शिकार?
खबरों के मुताबिक, इन बहनों ने बड़ी चतुराई से सरकारी रसूख का दिखावा किया।
किसी को कंप्यूटर ऑपरेटर तो किसी को सचिवालय में नौकरी का झांसा दिया गया।
मामला तब खुला जब ठगी के शिकार युवा फर्जी जॉइनिंग लेटर लेकर लखनऊ पहुंचे और वहां उन्हें पता चला कि उनके साथ लाखों की धोखाधड़ी हुई है।

लगभग 11.5 लाख रुपये की ठगी का यह मामला तो महज एक शुरुआत है; पुलिस को अंदेशा है कि पीड़ितों की संख्या और भी अधिक हो सकती है।

​ सतर्कता ही बचाव है,
यह घटना हमारे सिस्टम और समाज के लिए कई सवाल खड़े करती है:

​अंधविश्वास और जल्दबाजी:
सरकारी नौकरी पाने की होड़ में लोग बुनियादी वेरिफिकेशन करना क्यों भूल जाते हैं?

​पहचान का संकट:
फर्जी आईडी और पद का इस्तेमाल कर अपराधी समाज में खुलेआम घूम रहे हैं।

​डिजिटल साक्षरता की कमी: क्या हम इतने भोले हैं कि व्हाट्सएप पर आए लेटर और मौखिक वादों पर लाखों रुपये लुटा दें?

​निष्कर्ष
बरेली पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह समाज के लिए एक चेतावनी भी है। किसी भी विभाग में नियुक्ति की एक निर्धारित और पारदर्शी प्रक्रिया होती है।
"शॉर्टकट" और "सेटिंग" के नाम पर पैसे मांगने वाला हर व्यक्ति अपराधी हो सकता है।
यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, कानून के लंबे हाथ उन तक पहुंच ही जाते हैं।
​सावधान रहें, जागरूक रहें। नौकरी मेहनत से मिलती है, घूस से नहीं।

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