धर्म की आज़ादी बनाम पब्लिक व्यवस्था: सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश—सड़क जाम नहीं चलेगा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक सड़कों को अवरुद्ध किया जाए। कोर्ट ने माना कि हर समुदाय को अपने पूजा-पाठ और परंपराओं को निभाने की पूरी आज़ादी है, लेकिन यह आज़ादी सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने की कीमत पर नहीं हो सकती।
9 जजों की संविधान पीठ, जो सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी, ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब धार्मिक गतिविधियाँ किसी धर्मनिरपेक्ष (secular) गतिविधि—जैसे यातायात या आम जनजीवन—को प्रभावित करती हैं, तो सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
अनुच्छेद 25(2) का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि राज्य धार्मिक मामलों में दखल नहीं दे सकता। लेकिन न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “अगर कोई मंदिर वार्षिक रथ यात्रा निकालना चाहता है, तो वह अपनी धार्मिक परंपरा निभा सकता है, लेकिन इसके नाम पर सभी सड़कों को बंद नहीं किया जा सकता। सड़कें सार्वजनिक हैं, और उनका अवरोध धर्म से जुड़ा मामला नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि धार्मिक मामलों में समुदायों को स्वायत्तता है, लेकिन जैसे ही उसका असर आम जनता और सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ता है, राज्य नियमन के लिए आगे आ सकता है।