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": जब तफ्तीश के पन्ने कोरे रह जाएं: शेरघाटी हत्याकांड में साक्ष्यों का संकट"



विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

​न्याय का मूल सिद्धांत है कि 'सौ गुनहगार छूट जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए।'
शेरघाटी की एक अदालत द्वारा छह अभियुक्तों को हत्या जैसे जघन्य मामले में बरी करना इसी न्यायिक शुचिता का प्रमाण है, लेकिन साथ ही यह हमारी जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़ा करता है।

​बरहा गांव के रवींद्र यादव हत्याकांड ने 2024 में क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी।
जमीन विवाद की रंजिश और खजुराही डैम से मिला शव, ये सब एक सुनियोजित अपराध की ओर इशारा कर रहे थे।
पुलिस ने जांच की, चार्जशीट दाखिल की और मामला अदालत की चौखट तक पहुंचा।
लेकिन जैसे ही मामला साक्ष्यों और गवाहों की कसौटी पर कसा गया, अभियोजन पक्ष का आधार ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

​अदालत का स्पष्ट कहना कि 'साक्ष्य आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके',
सीधे तौर पर पुलिसिया जांच की विफलता की ओर संकेत करता है।

अक्सर देखा जाता है कि संगीन मामलों में पुलिस दबाव में आकर या जल्दबाजी में जांच की कड़ियों को सही तरीके से नहीं जोड़ पाती।
वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव और गवाहों के कमजोर बयानों के कारण कई बार असली अपराधी कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं।

​इस मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय कुमार श्रीवास्तव का यह कहना कि 'निर्णय तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित है', कानून की जीत को दर्शाता है।

लेकिन समाज के नजरिए से देखें तो एक बड़ा सवाल शेष रह जाता है—
अगर ये छह लोग दोषी नहीं थे, तो रवींद्र यादव का असली हत्यारा कौन है?
क्या साक्ष्यों के अभाव में न्याय का गला घोंटा गया या फिर निर्दोषों को झूठा फंसाने की कोशिश हुई थी?
​यह मामला एक सबक है कि केवल गिरफ्तारी और चार्जशीट दाखिल करना न्याय नहीं है। जब तक जांच एजेंसियां आधुनिक और वैज्ञानिक तफ्तीश को अपना आधार नहीं बनाएंगी, तब तक अदालतें इसी तरह 'साक्ष्यों के अभाव' में फैसला सुनाने को मजबूर रहेंगी। न्याय की इस प्रक्रिया में देरी और कमजोर तफ्तीश अंततः समाज के कानून पर भरोसे को ही कमजोर करती है।

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