आजमगढ़ में जलाशयों के संरक्षण की मांग: पर्यावरण और भविष्य दोनों का सवाल- लाल बिहारी (मृतक/ दागी)
आजमगढ़ जनपद में जलाशयों की बदहाल स्थिति को लेकर अब आवाज तेज होती जा रही है। बड़ैला ताल, सलोना ताल सहित अनेक तालाब और पोखरे, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा माने जाते थे, आज उपेक्षा और अव्यवस्था के कारण अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। इसी गंभीर मुद्दे को उठाते हुए मृतक संघ जन कल्याण ट्रस्ट एवं मृतक संघ ने मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन को जिलाधिकारी के माध्यम से एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है।
संस्था के प्रतिनिधि लालबिहारी (मृतक दागी) ने जलाशयों की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि जनपद के अधिकांश जलस्रोत गंदगी, अतिक्रमण, जलजमाव और रखरखाव की कमी के कारण धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। ये जलाशय केवल पानी के स्रोत भर नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में इनकी अहम भूमिका होती है। साथ ही, पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए ये जीवनदायिनी व्यवस्था हैं। इनके खराब होने से प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
उन्होंने विशेष रूप से बड़ैला ताल और सलोना ताल का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रमुख जलाशयों की हालत अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है। यदि समय रहते इनके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ये पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होगा, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए जल संकट जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।
ज्ञापन में जलाशयों के संरक्षण के साथ-साथ उनके आसपास व्यापक वृक्षारोपण की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। संस्था का मानना है कि आम, पीपल, बरगद, जामुन और इमली जैसे वृक्ष पर्यावरण को शुद्ध करने के साथ-साथ जैव विविधता को भी बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, सड़कों के किनारे लगे पुराने पेड़ों की लगातार कटाई पर भी चिंता जताई गई है और इसे तत्काल रोकने की मांग की गई है।
संस्था द्वारा चलाए जा रहे जनजागरूकता अभियानों के बावजूद अब प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है। ज्ञापन में मांग की गई है कि जलाशयों की नियमित सफाई, अतिक्रमण हटाने, जल संरक्षण उपायों को लागू करने और निरंतर निगरानी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही, वृक्षारोपण को एक जन आंदोलन के रूप में विकसित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इस अभियान से जुड़ सकें।
इस पहल को स्थानीय नागरिकों का भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। लोगों का कहना है कि जलाशयों का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। यदि प्रशासन और जनता मिलकर प्रयास करें, तो इन जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
अंततः, यह मुद्दा केवल कुछ तालाबों या पोखरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के पर्यावरण, जल संसाधन और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। समय रहते उठाए गए कदम ही इस दिशा में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।