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*कमिशन की कढ़ाही में पकता विकास, सरपंच बना ‘घनचक्कर’* *लाल टोपी राजू सोनी, राजनांदगांव*

*कमिशन की कढ़ाही में पकता विकास, सरपंच बना ‘घनचक्कर’*
*लाल टोपी राजू सोनी, राजनांदगांव*

राजनांदगांव। जिले में विकास कार्यों का हाल इन दिनों कुछ ऐसा है जैसे रसोई में दाल कम और मसाले ज्यादा हों। ऊपर से वर्चुअल भूमिपूजन की चमक-दमक, और नीचे जमीन पर काम का ठप पड़ जाना—यह विरोधाभास अब आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। जनपद पंचायत राजनांदगांव में हाल ही में आयोजित वर्चुअल भूमिपूजन कार्यक्रम ने कागजों पर तो विकास की गंगा बहा दी, लेकिन जमीनी हकीकत में ‘कमिशन का समुद्र’ लहराता नजर आ रहा है।
सूत्र बताते हैं कि विकास कार्य शुरू होने से पहले ही ‘शुभारंभ’ 15 प्रतिशत एडवांस कमीशन से हो चुका है। इसके बाद काम शुरू होने पर फिर 15 प्रतिशत की दूसरी किस्त तय है। यानी काम हो या न हो, कमीशन का पहिया पूरी रफ्तार से घूम रहा है। ऊपर से अलग-अलग विभागों—अधिकारी, पंच, जनपद और जिला पंचायत—का ‘अलग-अलग हिस्सा’ भी तय बताया जा रहा है। ऐसे में विकास का बजट कम और बंटवारा ज्यादा नजर आता है।
गुणवत्ता की बात करें तो यहां भी ‘समझौता एक्सप्रेस’ पूरी रफ्तार में है। सामग्री की रायल्टी, कीमत और गुणवत्ता में हेरफेर को जैसे अनिवार्य शर्त बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि जब नींव ही समझौतों पर रखी जाएगी, तो विकास की इमारत कितनी मजबूत होगी—यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प किरदार है ‘नया नवेला सरपंच’, जो आदर्शवाद लेकर मैदान में उतरा था, लेकिन अब व्यवस्था के चक्रव्यूह में ‘घनचक्कर’ बन चुका है। कभी बैठक, कभी बिल-वाउचर, कभी सचिव का आना-जाना, तो कभी अतिथि सत्कार में ठंडा-गरम की व्यवस्था—सरपंच का समय अब विकास से ज्यादा व्यवस्थाओं में बीत रहा है। ऊपर से रैली में सहयोग और जनपद के चक्कर, मानो जिम्मेदारियों का नहीं, बल्कि ‘कमिशन यात्रा’ का हिस्सा बन गया हो।
हालात इतने पेचीदा हैं कि यदि कहीं से कोई बात लीक हो जाए, तो ‘लेने के देने’ पड़ जाते हैं। एक सरपंच ने व्यंग्य में कहा—“सरकार को जो बनाना है बनाए, निगरानी हम करेंगे”, लेकिन असलियत यह है कि निगरानी करने की हिम्मत भी अब कम ही लोग जुटा पा रहे हैं।
वहीं, कुछ लोग इसे सियासी रंग देने में भी पीछे नहीं हैं। उनका कहना है कि यह सब क्षेत्रीय नेतृत्व को बदनाम करने की साजिश है और कमिशन की बातें महज अफवाह हैं। मामला कलेक्टर के सामने भी पहुंच चुका है और धीरे-धीरे तूल पकड़ रहा है।
इधर, डोंगरगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भी ‘15 प्रतिशत का फार्मूला’ चर्चा में है, जहां सरपंचों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही। उनका सीधा सा समीकरण है—“काम है तो कमिशन, और कमिशन नहीं तो काम नहीं।”
अब सवाल यह है कि राजनांदगांव जिले में विकास की असली तस्वीर क्या है—हकीकत या अफसाना? फिलहाल तो वर्चुअल भूमिपूजन के बाद भी जमीन पर सन्नाटा है और कमिशन की गूंज ज्यादा सुनाई दे रही है। आने वाला समय ही तय करेगा कि यह विकास की कहानी है या फिर ‘कमीशन पुराण’ का नया अध्याय।

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
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