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परिसीमन में मुस्लिम हितों की अनदेखी न हो: परवेज़ आलम भुट्टो सच्चर कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप सीट निर्धारण की मांग तेज


शाहगंज (जौनपुर)। प्रस्तावित परिसीमन को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में अल्पसंख्यक कांग्रेस के महासचिव व शाहगंज विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी परवेज़ आलम भुट्टो ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी कर मुस्लिम समुदाय के हितों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया है।
प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक पुनर्गठन न होकर सामाजिक न्याय का भी आधार होती है, ऐसे में इसमें किसी भी वर्ग की अनदेखी लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत होगी। उन्होंने विशेष रूप से मुस्लिम समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में सच्चर कमेटी की सिफारिशों का पूरी तरह पालन होना चाहिए।
उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2006 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट सुझाव दिया था कि अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों को अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित करने से बचा जाए। भुट्टो का कहना है कि इस दिशा में लापरवाही बरतने से मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित होती है और वे निर्णय प्रक्रिया से धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर मुस्लिम बहुल सीटों को अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जिससे वहां मुस्लिम उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के अवसर सीमित हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप जनसंख्या के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व घट रहा है।
अपनी बात को मजबूती देते हुए उन्होंने नगीना विधानसभा सीट का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी लगभग 46 प्रतिशत है, जबकि दलित आबादी करीब 22 प्रतिशत है। इसके बावजूद सीट अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित होने के कारण मुस्लिम मतदाता अपने समुदाय का प्रतिनिधि चुनने में असमर्थ हैं।
परवेज़ आलम भुट्टो ने परिसीमन को लेकर एक और गंभीर आशंका जताई। उन्होंने कहा कि कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव कर उन्हें अन्य क्षेत्रों से जोड़ने की कोशिश की जा सकती है, जिससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम जनता से अपील की कि वे इस मुद्दे पर सजग रहें और निष्पक्ष परिसीमन सुनिश्चित कराने के लिए एकजुट होकर आवाज़ उठाएं।
अंत में उन्होंने दोहराया कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब हर वर्ग को उसके अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व मिले, और इसके लिए सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करना समय की मांग है।

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