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अदालतों में 'सुलह' की नई सुबह: लोक अदालत और मध्यस्थता से बदलती तस्वीर ✍️ एडवोकेट सुधाकर कुमार (लेखक पटना हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं)

अक्सर जब भी कोर्ट-कचहरी का जिक्र होता है, तो आम जनमानस के मन में विवाद, तनाव और अंतहीन तारीखों की एक धुंधली तस्वीर उभरती है। लेकिन, न्याय के इन मंदिरों के भीतर एक और बेहद खूबसूरत और सकारात्मक बदलाव आकार ले रहा है, जिसकी चर्चा कम ही होती है। यह बदलाव है— 'मुकदमेबाजी' (Litigation) से 'समाधान' (Resolution) की ओर बढ़ता हमारा कानूनी समाज।
​हाल के वर्षों में पटना हाईकोर्ट सहित प्रदेश की तमाम निचली अदालतों में 'मध्यस्थता केंद्रों' (Mediation Centres) और 'लोक अदालतों' ने न्याय की एक नई परिभाषा गढ़ी है। एक वकील के तौर पर जब हम दो पक्षों को सालों पुराने पारिवारिक, वैवाहिक या संपत्ति के विवादों में उलझा देखते हैं, तो अदालत का फैसला किसी एक को जिताता तो है, लेकिन उनके आपसी रिश्तों को हमेशा के लिए खत्म कर देता है। इसके विपरीत, जब वही मामले मध्यस्थता या लोक अदालत के जरिए सुलझाए जाते हैं, तो वहां कोई 'हारता' या 'जीतता' नहीं है, बल्कि दोनों पक्ष अपनी सहमति से एक बीच का रास्ता निकालते हैं।
​आज के समय में एक अधिवक्ता की भूमिका केवल जिरह करने या केस जीतने तक सीमित नहीं रह गई है। आज का वकील समाज में एक 'शांतिदूत' (Peacemaker) और 'पुल' का काम भी कर रहा है, जो विवादों को खत्म कर परिवारों को टूटने से बचाता है। चेक बाउंस (NI Act) के मामले हों, वैवाहिक कलह हो या छोटे-मोटे दीवानी विवाद—इन वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) व्यवस्थाओं ने लाखों लोगों का पैसा, समय और मानसिक शांति बचाई है।
​जब राष्ट्रीय लोक अदालत के दिन कोई गरीब किसान या आम नागरिक सालों पुराने केस को खत्म कर, चेहरे पर राहत भरी मुस्कान और बिना किसी बैर-भाव के अपने घर लौटता है, तो न्यायपालिका की असली जीत वहीं होती है। हमारी कानूनी व्यवस्था अब सिर्फ सजा देने या नियम लागू करने का जरिया नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव और रिश्ते जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बन रही है। यह बदलती हुई तस्वीर भारतीय न्याय प्रणाली के एक उज्ज्वल और मानवीय भविष्य का संकेत है।

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