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जिस मिट्टी पर शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी, अंतिम समय में वही मिट्टी उन्हें नसीब नहीं हुई


एक दौर था जब सिवान की सरहदों के भीतर शहाबुद्दीन की मरजी के बिना परिंदा भी पर नहीं मारता था, लोग उन्हें 'सुल्तान' कहते थे और प्रतापपुर की कोठी से निकलने वाला हर फरमान पत्थर की लकीर होता था। बाहुबल और राजनीति के उस बेताज बादशाह ने कभी सोचा भी न होगा कि जिस मिट्टी पर उनकी तूती बोलती थी, अंतिम समय में वही मिट्टी उन्हें नसीब नहीं हुई।

तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे कोरोना से जंग हारने के बाद, जब मौत की खामोशी छाई, तो उनके वजूद को अपनों के कांधों और घर की पुश्तैनी जमीन का इंतजार था। लेकिन वक्त का सितम देखिए, कानूनी बंदिशों और हालातों की बेड़ियों ने उस रसूखदार 'साहब' को अपनी जन्मभूमि से सैकड़ों मील दूर दिल्ली के 'आईटीओ कब्रिस्तान' की गुमनाम मिट्टी में दफन होने पर मजबूर कर दिया। वह सुल्तान, जो अपनी जमीन के लिए दुनिया से लड़ गया, आज उसी जमीन से दूर परदेस की आगोश में सो रहा है—यह कहानी सत्ता के शिखर से शून्य तक के उस सफर की है, जहाँ अंत में सिर्फ खामोश दुआएं और बेबसी रह गई।

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