वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को विस्तार दें
वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को विस्तार दें
शंकराचार्य जयंती पर जन अभियान परिषद की एक दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न
मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद द्वारा शासकीय कन्या महाविद्यालय मुरैना के सभागार में रविवार को आदिगुरु शंकराचार्य की जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता शंकरदूत अनुराग शर्मा, सह वक्ता समाजसेवी सुधीर आचार्य, प्रोफेसर डॉ. विनायक सिंह तोमर, श्रीमती क्षमा कौशिक, संभागीय समन्वयक श्री धर्मेंद्र सिंह सिसौदिया, जिला प्रोढ़ अधिकारी डॉ. हरेन्द्र सिंह तोमर, जिला समन्वयक श्री सतीश सिंह तोमर, जिला समन्वयक आनंद विभाग श्री बालकृष्ण शर्मा, मास्टर ट्रेनर विश्वनाथ गुर्जर, नीतू भारद्वाज एवं अनिल मोदी स्थानीय कोऑर्डिनेटर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुति और संचालन श्री मनोज कुलश्रेष्ठ ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ शंकराचार्य जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ नीतू भारद्वाज द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना से हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता शंकरदूत अनुराग शर्मा ने बताया कि आज हम उस महापुरुष की जयंती मना रहे हैं, जिसने 8 साल की उम्र में संन्यास लिया, 16 साल की उम्र में सभी शास्त्रों पर अधिकार पा लिया और 32 साल के छोटे से जीवन में पूरे भारत को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में पिरो दिया। वे हैं - साक्षात् शिवावतार, अद्वैत वेदांत के प्रणेता, आदि गुरु शंकराचार्य। उन्होंने कहा कि माँ को वचन देकर केरल के कालड़ी से निकला वो 8 साल का बालक ’शंकर’ पूरे देश में घूमें। शास्त्रार्थ किए, कुतर्कों को खंडित किया, और ’ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का उद्घोष किया। यानी ब्रह्म ही सत्य है, ये जगत माया है।
शंकराचार्य ने सिर्फ दर्शन ही नहीं दिया, संगठन भी दिया। उत्तर में बद्रीनाथ - ज्योतिर्मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी - शारदा मठ, पूर्व में पुरी - गोवर्धन मठ, और पश्चिम में द्वारका - शारदा मठ। चारों दिशाओं को ज्ञान से जोड़ा। आज हम ’एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की बात करते हैं, शंकराचार्य ने 1200 साल पहले ही इसे जी कर दिखा दिया था। सह वक्ता समाजसेवी सुधीर आचार्य ने आज के युग में शंकराचार्य की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि आज हम भी बिखरे हुए हैं - जाति में, भाषा में, स्टेटस में, यानि अनेक भेदभाव हमारे जीवन को क्लेश से भर रहें हैं। टेंशन, डिप्रेशन, भटकाव हर घर की कहानी है। शंकराचार्य कहते हैंः “तुम शरीर नहीं हो, तुम मन नहीं हो, तुम आत्मा हो - सच्चिदानंद स्वरूप।“ जब हम अपने ’टेलेंट’ यानी अपनी आत्मा पर फोकस करते हैं, तो बाहरी टेंशन अपने आप दूर हो जाता है। उनका सबसे सरल मंत्र हमें ’भज गोविन्दम’’ में मिलता है। आचार्य ने निष्कर्ष रूप में कहा कि सभी मतभेद भुलाकर ’वसुधैव कुटुंबकम’ को जिएँ. इस भाव को विस्तार दें। अपना हर कर्म शंकर को समर्पित कर दें। क्योंकि आदि गुरु ने हमें देह से विदेह तक की यात्रा सिखाई। उन्होंने बताया कि मंदिरों में ही नहीं, हर इंसान में शिव है - ’अहं ब्रह्मास्मि’। समापन सत्र में मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद् के सम्भागीय समन्वयक श्री धर्मेंद्र सिंह सिसौदिया ने शंकराचार्य के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की अपील की। कार्यक्रम का आभार जिला समन्वयक श्री सतीश सिंह तोमर ने किया।
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