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उर्वरकों के संतुलित उपयोग करके किसान भाई बढ़ाएं अपनी शुद्ध आय : डॉ संजीत कुमार

उर्वरकों के संतुलित उपयोग करके किसान भाई बढ़ाएं अपनी शुद्ध आय : डॉ संजीत कुमार
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र सोहांव, बलिया द्वारा आयोजित उर्वरकों का संतुलित उपयोग विषयक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ संजीत कुमार ने कहा किसान भाईयों उर्वरकों के संतुलित मात्रा में उपयोग के अंतर्गत फसल की पोषक तत्वों की आवश्यकताओं, मिट्टी की उर्वरता की स्थिति और मौजूदा जलवायु परिस्थितियों के आधार पर सभी आवश्यक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स को उचित अनुपात, मात्रा, समय और तरीकों से लागू करना शामिल है। भारत सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, पोषक तत्व आधारित सब्सिडी, नीम-लेपित यूरिया, और नैनो उर्वरकों सहित कई पहलों के माध्यम से उर्वरकों के संतुलित उपयोग को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। कृषि मृदा स्वास्थ्य में सुधार और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाकर संतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग को सुदृढ़ बनाती है, साथ ही पोषक तत्वों की क्षति को कम करती है और दीर्घकालिक उत्पादकता को बनाए रखती है। मृदा परीक्षण आधारित अनुशंसाएं, अनुकूलित उर्वरक तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन दृष्टिकोण उर्वरकों के अधिक सटीक और प्रभावी उपयोग को सक्षम बनाते हैं।
केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ अनिल पाल ने बताया उर्वरकों के संतुलित उपयोग का औचित्य नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों पर असंतुलित निर्भरता तथा जैविक खादों के उपयोग में कमी के परिणामस्वरूप पोषक तत्वों में असंतुलन उत्पन्न हुआ और मृदा स्वास्थ्य में क्रमिक गिरावट आई। उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग से द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का क्षरण तेज़ हुआ, मृदा संरचना बिगड़ी तथा अपवाह और रिसाव के माध्यम से पोषक तत्वों की हानि बढ़ी। असंतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग से दुष्परिणाम केवल मृदा क्षरण तक सीमित नहीं हैं। ये प्रक्रियाएं पर्यावरणीय प्रदूषण को और बढ़ावा देती हैं l
फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ अभिषेक यादव ने बताया संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पोषक तत्वों के अधिकतम अवशोषण और हानियों को न्यूनतम करके उर्वरक उपयोग दक्षता को बढ़ाता है, साथ ही पोषक तत्वों के बीच सहक्रियात्मक अंतःक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है, जो पौधों की बेहतर वृद्धि, फसल प्रदर्शन और उत्पादकता को सहारा देती हैं। यह दीर्घकाल में मृदा उर्वरता—जिसमें मृदा कार्बनिक पदार्थ और जैविक स्वास्थ्य शामिल हैं—को बनाए रखता है, पर्याप्त पोषण के माध्यम से संभावित और वास्तविक फसल उपज के बीच के अंतर को कम करने में सहायक होता है, तथा असंतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पन्न पोषक तत्व अपवाह, रिसाव और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसे पर्यावरणीय प्रभावों को घटाता है। केंद्र के पशु चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ जितेंद्र कुमार ने कहा असंतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग करने के नकारात्मक प्रभाव पशुधन क्षेत्र तक भी होते हैं, क्योंकि पोषक तत्वों से वंचित मृदाओं पर उगाई गई फसलों में अक्सर चारा एवं आहार के लिए आवश्यक खनिज तत्वों की कमी पाई जाती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनकी उत्पादकता में कमी आती है। जिसके परिणामस्वरूप, पोषक तत्वों का असंतुलन एकीकृत फसल–पशुधन उत्पादन प्रणालियों की दीर्घकालिक स्थिरता और दक्षता के लिए एक गंभीर बाधा बन जाता है। अतः मृदा उर्वरता को बनाए रखना और वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ कृषि पद्धतियों को अपनाना कृषि उत्पादन की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। मृदा उर्वरता, जो इसके रासायनिक, भौतिक और जैविक गुणों द्वारा निर्धारित होती है, पोषक तत्वों के कुशल उपयोग, आर्थिक व्यवहार्यता तथा पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है। उद्यान वैज्ञानिक डॉ अवधेश कुमार ने फल, फूल एवं सब्जियों की फसलों में संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों के उपयोग करने के बारे में विस्तृत जानकारी दिया l पादप प्रजनन वैज्ञानिक डॉ मनोज कुमार ने कहा उर्वरकों का संतुलित उपयोग सतत कृषि का एक मूलभूत स्तंभ है, जो कृषि संबंधी, आर्थिक तथा पर्यावरणीय स्तर पर व्यापक लाभ प्रदान करता है। कार्यक्रम समापन के दौरान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ संजीत कुमार ने सभी किसानों वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा
स्थल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन के जरिये फसल की वास्तविक आवश्यकता और खेत के भीतर मृदा भिन्नता के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करें। समान उर्वरक खुराक के बजाय, यह सुनिश्चित कर लें कि पोषक तत्व केवल वहीं और तभी लगाए जाएँ, जहाँ और जब उनकी आवश्यकता हो। इस कार्यक्रम के दौरान डॉक्टर सतीश कुमार यादव, श्री धर्मेंद्र कुमार, श्री रामतोल आदि कर्मचारी गण उपस्थित रहे।

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