मन...
एक कविता
मन, मनही मन, सुगंधित फूल लगे,
तब भयो मंगल विचार ।
प्रसन्नचित रहे, तन मन हमारा,
हो निरोग काया पर अधिकार।।
मेरे तन मन में, त्रेता युग के राम बसे,
बसे द्वापर युग के कृष्ण हमार ।
आ साधु संत की वाणी कभी,
होत ना कभी बेकार।।
ता पूजे ईश्वर तुम, बनाओ संतो से संस्कार,
इसी मूल भावनाओं से, वसुंधरा हो निहाल।
ईश्वर ही प्रकृति है, प्रकृति मनुष्य का आधार,
इसी के आंगन में, मनुष्य का जीवन, होत बहुत गुणवान।।
रोपत सींचत तन मन को, वाणी हो अमृत का धार,
जैसे झरने का पानी, गिरत, रखत स्वच्छ विचार।
तेरा मेरा कुछ नहीं, हो मानव से मानव का लगाव,
हर युग के कुल में, मानवता बसे, बसे हर युग में प्यार।।
नदी के तट पर खड़ा होकर, सिर्फ सोच से, ना करो उसे पार,
पहले तुम किनारे पे तैरना सीखो, तब नदी को करो पार।
पर्वत हमेशा ऊंच होत है, पर होत उसके अच्छे संस्कार,
जो नर चढ़ना चाहे उस पे,चढ़ जाये,अनेकों बार।।
तुम भी राम और सीता बनो, स्वयं पे रखो विश्वास,
युग में गर कुछ घटित हो, रोये संसार,हजार बार।
गीता के उपदेश ही जीवन में आता है हमेशा काम,
रामायण से राम को जानो,गीता से कृष्ण भगवान।।
प्रफुल्लित हो संसार हमारा,स्वभाव निर्मल अनुराग,
ऐसा फूल खिले जग में,की हो सब सुगंधित संसार।
प्रेम से विचलित ना हो कभी,मन कहता बराम बार,
रखो अपने जीवन में, सदा ही नेक अभिविचार।।
सप्रेम धन्यवाद
🙏❤️🌹🎉