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स्वामी आत्मानंद स्कूल पेंड्रावन की दुर्दशा उजागर: सुरक्षा और व्यवस्थाओं की पोल खोल, प्रशासन की नींद कब खुलेगी?

सारंगढ़-बिलाईगढ़/पेंड्रावन//ग्राम पेंड्रावन का स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिन्दी माध्यम विद्यालय इन दिनों बदहाली और अव्यवस्था का ऐसा उदाहरण बना हुआ है, जो शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सरकारी खर्च से संचालित यह मॉडल स्कूल बदइंतजामी के ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिसका सीधा असर बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई पर पड़ रहा है।
मुख्य गेट बिना दरवाजे के—स्कूल असुरक्षा का खुला मैदान
सूत्र बताते हैं कि विद्यालय के मुख्य गेट में कुछ महीने पहले तक दरवाजा लगा हुआ था, लेकिन टूटने के बाद उसे अभी तक सुधारा नहीं गया।
दरवाजा न होने के कारण असामाजिक तत्वों का परिसर में बिना रोक-टोक आना-जाना जारी है।
क्या यही है सुरक्षित स्कूल का मॉडल?
टूटी खिड़कियाँ—बच्चों की सुरक्षा से खुला खिलवाड़
विद्यालय में कई खिड़कियों के शीशे महीनों से टूटे पड़े हैं।
तेज हवा, बारिश और सुरक्षा जोखिमों के बीच छात्र पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
प्रबंधन की लापरवाही का यह हाल है कि टूटी खिड़कियाँ जैसे उनकी प्राथमिकता में ही नहीं हैं।
सीसीटीवी कैमरा बंद—सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ठप
विद्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरे महीनों से बंद पड़े हैं।
एक तरफ सरकार स्कूलों में सुरक्षा को लेकर सख्त दिशा-निर्देश देती है, दूसरी तरफ यहाँ कैमरे बंद होने से कोई निगरानी संभव ही नहीं है।
सवाल उठता है—क्या किसी घटना के बाद ही कैमरे सुधरेंगे?
टूटी-फूटी बाउंड्री वॉल—किसी के भी अंदर घुसने की खुली छूट
कई जगह बाउंड्री वॉल टूटी हुई है, ऊँचाई भी बेहद कम है।
बाहरी लोगों का प्रवेश आसान हो चुका है, जो छात्र-छात्राओं की निजता और सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा है।
क्या प्रबंधन को यह खतरा दिखता ही नहीं, या दिखाकर भी अनदेखी की जा रही है?
शाला प्रबंधन समिति की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल
ग्रामीणों ने कई बार समस्याएँ उठाईं, पर शाला प्रबंधन समिति की चुप्पी और निष्क्रियता ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
समिति का कार्य ही है समस्याओं का समाधान और स्कूल की निगरानी—but यहाँ समिति खुद सवालों के घेरे में है।
ग्रामीणों की उम्मीद अब प्रशासन पर—खबर बनेगी तो कार्रवाई होगी?
गांव के लोग अब इस आशा में हैं कि इस गंभीर स्थिति के उजागर होने के बाद
जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और जिम्मेदार अधिकारी तत्काल संज्ञान लेंगे।
लोगों का साफ कहना है—
“स्कूल हमारा है, बच्चे हमारे हैं… अगर अब भी सुधार नहीं हुआ तो फिर कब?”

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