भारत में एक कानून होना चाहिए कि 2010 साल के बाद जन्में लोगों को सिगरेट के धुएं की लत न लगे।
यह सुझाव बहुत दूर की सोचने वाला और समाज की भलाई के लिए है। सिगरेट और तंबाकू जैसे नशे न सिर्फ इंसान की सेहत को अंदर से खराब करते हैं, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से भी बर्बाद कर देते हैं। उसूलों की बात करें तो, अगर देश के कानून में ऐसे सख्त उसूल शामिल कर दिए जाएं, तो आने वाली पीढ़ी को इस दलदल से निकाला जा सकता है। इस विषय पर कुछ ज़रूरी बातें सोचने लायक हैं: नई पीढ़ी को बचाना दुनिया के कुछ देशों (जैसे न्यूजीलैंड ने पहले कोशिश की थी) ने ऐसे मॉडल पर काम किया है कि एक खास साल के बाद पैदा हुए बच्चों को तंबाकू बेचना गैर-कानूनी कर दिया जाना चाहिए। अगर भारत में भी ऐसा होता है: तो कैंसर और फेफड़ों की बीमारियों में भारी कमी आएगी। सरकार का जो बड़ा बजट बीमारियों के इलाज पर खर्च होता है, वह बचेगा। चुनौतियाँ और सच्चाई भारत जैसे बड़े देश में ऐसा कानून लागू करना ज़रूर मुश्किल है क्योंकि: गैर-कानूनी बिक्री: कानून बनने के बावजूद, कभी-कभी चीज़ें चोरी-छिपे बिकती रहती हैं। तंबाकू की खेती और फैक्ट्रियों से लाखों लोगों को रोज़गार मिलता है, जिसके लिए सरकार को दूसरे इंतज़ाम करने होंगे। जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है। सिर्फ़ कानून काफ़ी नहीं है, इंसान को खड़े होने के लिए एक मकसद चाहिए: स्कूल और कॉलेज में नैतिक शिक्षा के ज़रिए बच्चों को यह समझाना होगा कि ड्रग्स कोई "स्टाइल स्टेटमेंट" नहीं बल्कि कमज़ोरी है। सामाजिक तौर पर हमें उन लोगों को रोल मॉडल बनाना चाहिए जो ड्रग-फ़्री ज़िंदगी जीते हैं, न कि ड्रग एडिक्ट्स को। "कानून शरीर को रोक सकता है, लेकिन उसूल दिमाग को रोकते हैं।" अगर लोगों में कानून के साथ-साथ उसूल भी मज़बूत हों, तो भारत सही मायने में ड्रग-फ़्री बन सकता है। क्या आपको लगता है कि सिर्फ़ जुर्माना लगाने से लोग रुक जाएँगे, या इसके लिए सोशल बॉयकॉट जैसा कोई और सख़्त तरीका होना चाहिए?
🍳*हरबंस सिंह, एडवाइजर* 🙏🏻
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