“जलप्रदाय के समय अंधकार: दीनदयाल नगर की प्यास और व्यवस्था की विफलता”...
रतलाम के दीनदयाल नगर, सेक्टर ‘ए’ की यह कथा केवल एक मोहल्ले की समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्थागत उदासीनता का जीवंत दस्तावेज बन चुकी है। दिनांक 20 अप्रैल को जलप्रदाय हुआ, जिसका अगला क्रम 22 अप्रैल को होना था, परंतु उस दिन जल नहीं पहुँचा। प्रतीक्षा की घड़ियाँ बढ़ीं और 23 अप्रैल को जलप्रदाय का क्रम आया, किंतु नियति की विडंबना देखिए—संध्या 6 बजे, जब जलप्रवाह का समय निर्धारित था, उसी क्षण विद्युत आपूर्ति ठप हो गई। परिणामतः न जल का संचय हो सका, न ही सामान्य जीवन की धारा सुचारु रह पाई।
अब अगला जलप्रदाय 25 अप्रैल को होना है, परंतु प्रश्न यह है कि सोमवार से शनिवार तक जीवन का निर्वाह कैसे हो? जल, जो जीवन का आधार है, वही जब अनिश्चितता के अंधकार में डूब जाए, तब नागरिक किससे आशा करें? एक ओर जलापूर्ति की अनियमितता, दूसरी ओर विद्युत विभाग की असंवेदनशीलता—इन दोनों के बीच आमजन पिसता हुआ दिखाई देता है।
स्थिति यहाँ तक विकट हो चुकी है कि यदि कोई परिवार दो दिनों के लिए जल भंडारण हेतु टैंकर मंगवाना चाहे, तो उसे लगभग ₹550 का अतिरिक्त भार वहन करना पड़ता है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस आर्थिक बोझ की भरपाई कौन करेगा? क्या यह दायित्व आम नागरिकों पर ही थोप दिया जाएगा, या फिर संबंधित विभाग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे?
यह भी अत्यंत चिंतनीय है कि इस समस्या को लेकर बार-बार निवेदन, शिकायतें और सोशल मीडिया के माध्यम से आग्रह किए गए, किंतु परिणाम शून्य ही रहा। मानो व्यवस्था के कानों पर जड़ता का ऐसा पर्दा पड़ा हो, जिसे न जन-पीड़ा भेद पा रही है, न ही तथ्यात्मक प्रस्तुति।
आवश्यकता है कि मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी और जलप्रदाय विभाग इस विषय को केवल एक औपचारिक शिकायत न मानकर, मानवीय संवेदना के दृष्टिकोण से देखें। कम से कम जलप्रदाय के समय विद्युत आपूर्ति को निर्बाध और सुनिश्चित करना कोई असंभव कार्य नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उत्तरदायित्व का न्यूनतम मानक है।
यदि अब भी यह स्थिति यथावत बनी रहती है, तो यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन जाएगी। समय आ गया है कि जिम्मेदार संस्थाएँ अपनी भूमिका को समझें और आमजन को इस मूलभूत अधिकार—जल—से वंचित होने से बचाएँ। ✍️