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मीनारे16वीं सदी के महान शासक शेर शाह सूरी ने बनवाई थीं।

आपको इस तरह की लाट दिखे - असल मे यह सड़क पर दूरी बताने के लिए बनवाया जाता था. इससे कोस ( किलोमीटर ) पता चलत्ता था कि आप कितना चले है .

इस तरह की मीनारे गाज़ीपुर से बनारस, इलाहबाद, आजमगढ़, गोरखपुर, बिहार, कोलकाता में 16वीं सदी के महान शासक शेर शाह सूरी ने बनवाई थीं।

उनका मक़सद था—हर “कोस” यानी हर 3.2 किलोमीटर पर एक ऐसा ऊँचा चिन्ह लगवाना, जिससे सफर करने वालों को पता चले कि वे कितनी दूरी तय कर चुके हैं।

ये मीनारें ईंट और चूने से बनी बेलनाकार (गोल) टावर होती थीं। बाद में अकबर, शाहजहाँ जैसे मुग़ल शासकों ने भी इन मीनारों की संख्या बढ़ाई और रास्ते में सराय भी बनवाईं, ताकि मुसाफिरों को आराम करने की जगह मिले।

आज भी ये मीनारें दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के खेतों, रेलवे ट्रैक और सड़कों के पास दिखाई देती हैं।

यही मीनारें एक वक़्त में भारत की पहली "दूरी बताने वाली व्यवस्था" का हिस्सा थीं — जिनकी तारीफ यूरोपीय यात्री भी करते थे।

तो अगली बार जब आप किसी कोस मीनार को देखें, समझिए कि आप इतिहास की उस सड़क पर खड़े हैं, जहाँ से कभी शाही काफ़िले, व्यापारी और मुसाफिर गुजरा करते थे।

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Afzal shah
Lucknow

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