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गौहाटी हाईकोर्ट का सख्त आदेश: असम में भैंसों की लड़ाई (मोह जूज) पर तत्काल रोक, आयोजकों पर होगी दंडात्मक कार्रवाई


गौहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार, विशेष रूप से गृह एवं राजनीतिक विभाग को निर्देश दिया है कि राज्य में कहीं भी भैंसों की लड़ाई (मोह जूज) आयोजित न होने दी जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि इस प्रकार के आयोजन होते हैं तो उनके आयोजकों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाए। यह अंतरिम आदेश अगले आदेश तक प्रभावी रहेगा।न्यायमूर्ति अंजन मोनी कलिता ने यह आदेश ‘पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स इंडिया’ (PETA इंडिया) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जनवरी माह में असम के विभिन्न जिलों में अवैध रूप से भैंसों की लड़ाई आयोजित की गई, जिसमें पशुओं के साथ गंभीर क्रूरता बरती गई। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि ‘प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960’ के तहत इस प्रकार की गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे आयोजन न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि पूर्व में स्थापित न्यायिक निर्णयों के भी विपरीत हैं। PETA इंडिया द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों में कई चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। फोटो और वीडियो के माध्यम से यह दिखाया गया कि भैंसों को जबरन लड़ाने के लिए उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, भैंसों को मोटे डंडों से लगातार पीटा गया, उनकी नाक में रस्सी डालकर खींचा गया और उन्हें जबरन भिड़ाया गया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। कई मामलों में भैंसों के शरीर पर गहरे घाव और खून से लथपथ हालत भी देखी गई। साक्ष्यों में यह भी सामने आया कि एक घटना के दौरान एक व्यक्ति को भागते हुए भैंस ने बुरी तरह घायल कर दिया, जिससे इस प्रकार के आयोजनों के दौरान मानव जीवन के लिए भी खतरा उजागर हुआ है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद राज्य प्रशासन के सामने अब यह चुनौती है कि वह इस प्रतिबंध को प्रभावी रूप से लागू करे और भविष्य में इस तरह की अवैध गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाए। इस फैसले को पशु अधिकार संगठनों ने एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, वहीं सामाजिक संगठनों ने भी इसे कानून और मानवीय संवेदनाओं की दिशा में आवश्यक निर्णय बताया है।

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