*नारी वंदन के भाजपाई तरीके और प्रधानमंत्री की जुगाली*
*(आलेख : एम.ए. बेबी, अनुवाद : संजय पराते)*
*प्रकाशनार्थ*
*नारी वंदन के भाजपाई तरीके और प्रधानमंत्री की जुगाली*
*(आलेख : एम.ए. बेबी, अनुवाद : संजय पराते)*
17 अप्रैल को प्रधानमंत्री को संसद में एक बड़ा झटका लगा। इसके बाद, प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक प्रसारक, दूरदर्शन का दुरुपयोग करके राष्ट्र के नाम अपने तथाकथित संबोधन को प्रसारित किया, जो कि आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का घोर उल्लंघन है। यह उल्लंघन ऐसे समय में किया गया है, जब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, और आदर्श आचार संहिता अभी भी पूरी तरह से लागू है।
संविधान संशोधन विधेयक को पेश करना अपने आप में आदर्श आचार संहिता का खुला उल्लंघन था, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया अभी भी जारी थी। भाजपा की अपनी राजनीतिक गणना के अलावा, संसद का विशेष सत्र बुलाने का कोई और कारण नहीं था। यह विधेयक और इसके साथ आए दो अन्य विधेयक, जो इस पैकेज का हिस्सा थे, आसानी से 12 और दिनों तक इंतज़ार कर सकते थे।
खैर, लोकसभा में हुई घोर अपमानजनक स्थिति के बाद, प्रधानमंत्री का भाषण अपना चेहरा बचाने की एक नाकाम कोशिश के अलावा और कुछ नहीं था ; और यह तब हुआ, जब विपक्ष की एकता के चलते उनका संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था। सरासर यह एक बिना सोचे-समझे दिया गया राजनीतिक भाषण था। उन्होंने विपक्षी दलों को निशाना बनाया, उनके नाम लिए और सत्ताधारी दल के पक्ष में जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की। लेकिन हमारे देश की जनता — खासकर महिलाएँ — उनकी इस बेतुकी नौटंकी को अच्छी तरह समझ गई हैं!
अपने पूरे भाषण के दौरान, प्रधानमंत्री भारतीय महिलाओं को माँ, बहन और बेटी के रूप में ही संबोधित करते रहे। ऐसा लग रहा था, मानो वे इस देश के समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति में महिलाओं को बराबर का भागीदार मानने के लिए तैयार ही नहीं है। इस बात को स्वीकार न करने की उनकी अनिच्छा इस तथ्य से और भी ज़्यादा साफ़ हो गई है कि उनकी सरकार संसद और राज्य विधानसभाओं में पहले से मौजूद सीटों की संख्या के भीतर ही महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने को तैयार नहीं थी। उन्होंने भारतीय महिलाओं से साफ़-साफ़ कह दिया कि देश के फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में उन्हें अपना उचित हिस्सा तभी मिल सकता है, जब फ़ैसले लेने वालों की संख्या बढ़ाई जाए। प्रधानमंत्री की यह स्वीकारोक्ति उन कई बेहद परेशान करने वाली घटनाओं के साथ बिल्कुल मेल खाती है, जो उनके अपने शासनकाल में महिलाओं को न्याय दिलाने के मामले में व्यवस्थागत विफलताओं, राजनीतिक चुप्पी और, कभी-कभी, तो साफ़-साफ़ मिलीभगत को भी उजागर करती हैं।
*बिलकिस बानो और उससे आगे : यही है भाजपा का 'नारी वंदन'
बिलकिस बानो का ही मामला ले लीजिए, जिनका 2002 के दंगों के दौरान हुआ सामूहिक बलात्कार, क्रूरता और जुझारूपन, दोनों का प्रतीक बन गया था। 2022 में, उनके दोषी बलात्कारियों की सज़ा माफ़ करके उन्हें रिहा किया गया, और उसके बाद भाजपा नेताओं ने माला पहनाकर उनका सार्वजनिक रूप से स्वागत किया। इस घटना ने एक बेहद डरावना संदेश दिया कि आख़िर किसका न्याय मायने रखता है। मोदी और उनके साथियों की चुप्पी ने इस ज़ख्म को और भी गहरा कर दिया। उन्नाव में, बलात्कार की उस पीड़िता को — जिसने भाजपा के एक ताक़तवर विधायक पर आरोप लगाया था — धमकियों को झेलना पड़ा, एक संदिग्ध सड़क दुर्घटना, जिसमें उसके रिश्तेदारों की जान चली गई, का शिकार होना पड़ा और न्याय के लिए एक लंबी लड़ाई का सामना करना पड़ा। इसी तरह, कठुआ मामले में — जहाँ आठ साल की एक बच्ची के साथ बेरहमी से बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई थी — भाजपा के राजनीतिक नेताओं को आरोपियों के बचाव में रैलियाँ निकालते हुए देखा गया। ये महज़ अपराध नहीं थे ; ये ऐसे पल थे, जिन्होंने हमारे देश के नेताओं की नैतिक दृढ़ता की परीक्षा ली, और यह भी बेनकाब कर दिया कि उनमें नैतिकता पूरी तरह से नदारद है।
उत्तराखंड में 18 साल की अंकिता भंडारी की हत्या ने एक और कड़वी सच्चाई को उजागर किया है ; महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वालों और राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों के बीच के संबंधों को। राज्य की भाजपा सरकार द्वारा इस मामले को जिस धीमी गति और अपारदर्शी तरीके से संभाला गया, उससे इस बात पर गंभीर चिंता पैदा हो गई हैं कि क्या राजनीतिक दबाव के आगे न्याय झुक जाता है, क्योंकि आरोपी ऐसे परिवारों से थे, जिनके संबंध भाजपा से थे। उतनी ही परेशान करने वाली बात भाजपा सरकारों द्वारा गुरमीत राम रहीम सिंह और आसाराम बापू जैसे दोषी 'धर्मगुरुओं' के प्रति दिखाई गई नरमी का रवैया है। बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद, उन्हें बार-बार पैरोल दिया जाना न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे को कमज़ोर करता है और यौन अपराधियों को भाजपा द्वारा दिए जा रहे राजनीतिक संरक्षण पर वाजिब सवाल खड़े करता है।
*महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनकर आरक्षण की जुगाली*
राजधानी के करीब, विरोध प्रदर्शन कर रही महिलाओं के साथ किया जाने वाला बर्ताव — चाहे वे जवाबदेही की मांग करने वाली पहलवान हों या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में अपनी शिकायतों के निवारण की मांग करने वाले मजदूर — यह दिखाता है कि सरकार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उनकी आवाज़ दबाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखती है। महिलाओं को पीटे जाने, घसीटे जाने, हिरासत में लिए जाने और चुप कराए जाने की तस्वीरें, महिलाओं के सशक्तिकरण के सरकारी दावों के बिल्कुल विपरीत हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बाद, ज़्यादातर राज्यों में मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं के नाम हटाए जाने की चिंता, चुपके-चुपके और खतरनाक तरीके से उनका मताधिकार छीनने की ओर इशारा करती हैं। जब महिलाओं को लोकतांत्रिक भागीदारी से बाहर कर दिया जाता है, तो उनकी सुरक्षा और अधिकार और भी ज़्यादा खतरे में पड़ जाते हैं।
लगभग तीन सालों से, भाजपा सरकार मणिपुर की महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने में नाकाम रही है। वहाँ बलात्कार की घटनाएँ लगातार हो रही हैं और राज्य में महिलाओं के लिए बनी हेल्पलाइन पर काम का बोझ बहुत ज़्यादा है। मणिपुर से सामने आई दिल दहला देने वाली कहानियों ने, जिनमें महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने के वीडियो भी शामिल थे, पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। फिर भी, इस मामले में तुरंत जवाबदेही की कमी और देर से की गई कार्रवाई ने, देश के शासन के सर्वोच्च स्तरों पर मौजूद उस उदासीनता की धारणा को ही और मज़बूत किया है, जो तब देखने को मिलती है, जब लोगों के असल ज़िंदगी के मुद्दे भाजपा की राजनीतिक प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते। ये सभी बातें एक साफ़ पैटर्न की ओर इशारा करती हैं कि शासन का एक ऐसा ढाँचा मौजूद है, जहाँ महिलाओं की सुरक्षा को अक्सर राजनीतिक सहूलियत के आगे गौण मान लिया जाता है, जहाँ आक्रोश भी चुनिंदा होता है, और जहाँ इंसाफ़ भी एक जैसा नहीं मिलता।
*महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन था मकसद*
आम तौर पर वामपंथी दल, और विशेष रूप से सीपीआई(एम), देश में लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने की लड़ाई में हमेशा सबसे आगे रहे हैं। गीता मुखर्जी समिति की सिफ़ारिशों ने ही लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का आधार तैयार किया था। हमने संविधान (108वाँ संशोधन) विधेयक, 2010 का ज़ोरदार समर्थन किया था, जिसे राज्यसभा ने पारित कर दिया था। भाजपा सरकार को जो करना चाहिए था, वह यह था कि वह उस विधेयक को लोकसभा में भी पेश करती।
बहरहाल, भाजपा की दिलचस्पी हमेशा से मुख्य रूप से अपने संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे को साधने में ही रही है। यही वजह है कि वे 2023 में संविधान (128वाँ संशोधन) विधेयक लेकर आए। वामपंथी दलों समेत पूरे विपक्ष ने दोनों सदनों में इसका समर्थन किया, ताकि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत सुनिश्चित किया जा सके। इसके बावजूद, भाजपा ने इसे आगामी जनगणना से जोड़ दिया, जो अभी चल रही है। वरना, 2024 के आम चुनावों में ही महिलाओं को उनके लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिल गया होता। हालाँकि, पूरे विपक्ष ने यही माँग की थी, फिर भी भाजपा ने ऐसा क्यों नहीं किया?
इस बार वे असल में परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहते थे, और महिलाओं के लिए आरक्षण तो बस उनकी एक राजनीतिक आड़ थी! यह एक बेहद कुटिल चाल थी, जिसका मकसद संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में इस तरह हेर-फेर करना था कि संघ परिवार को अनुचित लाभ मिल सके। वे जम्मू-कश्मीर और असम में सीमित पैमाने पर ऐसा पहले ही कर चुके हैं। 1971 की जनगणना के आधार पर होने वाले परिसीमन पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि उसके बाद 1976 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की गई थी। पाँच दशकों के बाद, जिन राज्यों की जनसंख्या दूसरों के मुकाबले तेज़ी से बढ़ी है, उन्हें इस बात की चिंता है कि 'एक वोट, एक मूल्य' का सिद्धांत अब बेमानी होता जा रहा है, क्योंकि उनके सांसदों और विधायकों को अब कहीं ज़्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करना पड़ रहा है। लेकिन परिसीमन की कोई भी ऐसी प्रक्रिया, जो उन राज्यों की वास्तविक चिंताओं का समाधान न करे —जिनके मौजूदा आनुपातिक प्रतिनिधित्व में संसद में कमी आने का खतरा है, और वह भी सिर्फ इसलिए, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को ईमानदारी से लागू करने के लिए सचेत प्रयास किए थे — अत्यंत अन्यायपूर्ण होगी।
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को बिना किसी परिसीमन या जनगणना से जोड़े, तुरंत लागू किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए। दूसरों की तुलना में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होने का दिखावा करना महज़ एक छलावा है। 'नारी शक्ति वंदन' का जाप करना एक अर्थहीन बयानबाज़ी है।
*[लेखक सीपीआई(एम) के महासचिव, राज्य सभा के पूर्व सदस्य और केरल के पूर्व शिक्षा मंत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650]*
*Devashish Govind Tokekar*
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