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“क्या भारत में न्याय एकतरफा हो गया है? सवाल उठाने पर सज़ा, अपमान पर चुप्पी क्यों?

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सबसे बड़ा प्रश्न “न्याय” नहीं, बल्कि “समान न्याय” बन चुका है।
हाल के घटनाक्रमों ने एक खतरनाक प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है—
👉 एक तरफ खुलेआम धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने वाले लोग बिना किसी डर के घूमते नजर आते हैं,
👉 वहीं दूसरी तरफ, ऐतिहासिक तथ्यों या वैचारिक मत रखने वाले व्यक्तियों पर तुरंत कठोर कार्रवाई होती है।
क्या यह वही भारत है जहाँ संविधान सबको समान अधिकार देता है?
इतिहास गवाह है कि भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रयास का परिणाम है, जिसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित अनेक विद्वानों और सदस्यों का योगदान रहा। इस तथ्य को स्वीकार करना न तो अपराध है, न ही अपमान।
लेकिन आज स्थिति यह बनती जा रही है कि—
✔ कुछ विचारों को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का संरक्षण मिलता है,
✔ जबकि अन्य विचारों को “अपराध” की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
यह दोहरा मापदंड केवल कानून व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी सवाल खड़ा करता है।
राजनीति का खेल भी इस पूरे घटनाक्रम में कम महत्वपूर्ण नहीं है।आरोप लगते हैं कि समाज को “विचारधाराओं” के नाम पर बांटकर राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है।कभी “तुष्टिकरण” तो कभी “ध्रुवीकरण”—ये शब्द अब केवल बहस का हिस्सा नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बनते जा रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज में वैचारिक असहमति अब संवाद से नहीं, बल्कि टकराव से सुलझाई जा रही है।
मूल सवाल:
• क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो रहा है?
• क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब “चयनात्मक” हो गई है?
• क्या सरकारें निष्पक्ष हैं या राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित?
निष्कर्ष:
भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम—
👉 कानून को “समानता” के साथ लागू करते हैं या नहीं,
👉 और क्या हम असहमति को “अपराध” नहीं, बल्कि “लोकतंत्र की ताकत” मानते हैं।
जनता अब देख रही है, समझ रही है—और समय आने पर जवाब भी देगी।

समाज में बढ़ता वैचारिक टकराव
• “क्या हम संवाद से दूर और टकराव की ओर बढ़ रहे हैं?”
• “एक ही देश में दो तरह के कानून क्यों?”
• “अपमान करने वालों पर खामोशी और सवाल उठाने वालों पर कार्रवाई—क्यों?”
• “क्या लोकतंत्र अब ‘नैरेटिव’ से चल रहा है, न कि ‘न्याय’ से?”
“सवाल उठाना गुनाह नहीं है—लेकिन अगर सवाल उठाने पर ही सज़ा मिलने लगे,तो समझिए लोकतंत्र खतरे में है।”

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