logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

राशन दुकान पर अब कोयला: युद्ध की आँच बिहार के चूल्हे तक, LPG संकट के बीच बिहार सरकार का ऐतिहासिक — और चिंताजनक — फैसला;



विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की लपटें अब बिहार के गरीब घरों के चूल्हे तक पहुँच गई हैं।
बिहार सरकार के खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने 21 अप्रैल 2026 को एक ऐसा आदेश जारी किया है जो एक साथ कई भावनाएँ जगाता है —
राहत भी,
और गहरी बेचैनी भी।

आदेश साफ कहता है:
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत आच्छादित लाभुकों को जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों के माध्यम से अब कुकिंग कोयला (Cooking Coal) उपलब्ध कराया जाएगा।

क्यों आई यह नौबत?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से होर्मुज जलसंधि प्रभावित हुई है, जिससे भारत की LPG आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है।
भारत अपनी LPG जरूरतों का लगभग 60% कतर,
यूएई,
सऊदी
अरब ,
और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है।

मार्च 2026 में देश में LPG की खपत में सालाना आधार पर करीब 13% की गिरावट दर्ज की गई, जो सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और आपूर्ति बाधाओं से जुड़ी है।

केंद्र सरकार ने पहले ही होटल,
रेस्तरां को कोयला,
बायोमास और RDF जैसे वैकल्पिक ईंधन इस्तेमाल करने की छूट दे दी थी —
और अब बिहार ने गरीब घरों तक यही विकल्प पहुँचाने का निर्णय लिया है।

बिहार समेत 9 राज्यों ने कमर्शियल LPG के आवंटन के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

राहत और सवाल — दोनों एक साथ:
राहत यह है कि बिहार सरकार ने संकट को पहचाना और गरीब लाभुकों के लिए वैकल्पिक ऊर्जा की व्यवस्था की दिशा में कदम उठाया।
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत त्वरित कार्रवाई का यह प्रयास सराहनीय है।

लेकिन सवाल गहरे हैं —
पहला सवाल —
उज्ज्वला योजना का क्या हुआ?
2016 से शुरू हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का नारा था —
"धुआँमुक्त रसोई,
स्वस्थ परिवार।
" करोड़ों बिहारी महिलाओं को LPG कनेक्शन दिया गया, उन्हें लकड़ी-कोयले के धुएँ से मुक्ति का सपना दिखाया गया।
बिहार जैसे राज्य के लिए,
जहाँ बड़ी आबादी उज्ज्वला योजना पर निर्भर है,
गैस की किल्लत ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती है।
अब उन्हीं को फिर से कोयला थमाना — यह प्रगति का उलटा सफर नहीं तो क्या है?

दूसरा सवाल —
कितना,
कब,
कितने दाम पर?
राशन कार्ड धारी को कब और कितना कोयला मिलेगा, इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है।

आदेश जारी हो गया — खान विभाग, परिवहन विभाग और सभी 38 जिलों के DM को पत्र भेज दिया —
लेकिन लाभुक के घर तक कोयला पहुँचने की ठोस समयसीमा, मात्रा और दर अभी भी अस्पष्ट है।
बिहार में PDS प्रणाली की जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं —
राशन में अनाज के लिए भी महीनों इंतज़ार होता है, कोयला कब मिलेगा?

तीसरा सवाल — स्वास्थ्य और पर्यावरण का क्या?
कोयले से खाना पकाने पर घर के अंदर वायु प्रदूषण होता है जो फेफड़ों, आँखों और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है।
WHO के अनुसार, घर के अंदर ठोस ईंधन के धुएँ से हर वर्ष लाखों मौतें होती हैं —
और इनमें सर्वाधिक पीड़ित महिलाएँ और बच्चे होते हैं।

चौथा सवाल — दीर्घकालिक ऊर्जा नीति कहाँ है?
यह संकट अचानक नहीं आया। होर्मुज जलसंधि पर खतरे की चेतावनियाँ महीनों से थीं। पाइपलाइन कनेक्टिविटी, PNG नेटवर्क और इंडक्शन कुकिंग जैसे दीर्घकालिक विकल्पों की ओर कदम बढ़ाने की ज़रूरत थी।
क्या बिहार सरकार के पास ऊर्जा विविधीकरण की कोई दूरदर्शी नीति है — या हर संकट में आपातकालीन जुगाड़?
निष्कर्ष
बिहार सरकार का यह आदेश जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं।
वैश्विक युद्ध के कारण आए ऊर्जा संकट में गरीब परिवारों को वैकल्पिक ईंधन देना सरकार की जिम्मेदारी है —
यह सही कदम है।

लेकिन कोयले की राशन दुकान तक पहुँचाने की व्यावहारिक रूपरेखा, स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय, महिलाओं पर पड़ने वाले असर और इस संकट से दीर्घकालिक निकास की योजना —
ये सब अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा में हैं।

"धुआँमुक्त बिहार" के नारे से "कोयला राशन" तक का यह सफर — यह बताता है कि वैश्विक युद्ध की आँच सबसे पहले और सबसे गहरे गरीब की रसोई में पहुँचती है।

0
0 views

Comment