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बेगमी दलान हज़रत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (रहमतुल्लाह अलैह) के आस्ताना-ए-मुबारक (दरगाह शरीफ)

बेगमी दलान हज़रत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (रहमतुल्लाह अलैह) के आस्ताना-ए-मुबारक (दरगाह शरीफ) का पूर्व की ओर स्थित मुख्य प्रवेश द्वार है। जैसा कि इसके नाम से ही साफ़ ज़ाहिर होता है, इस दलान की तामीर शहज़ादी जहाँ आरा बेगम ने अपने पिता शाहजहाँ के शासनकाल में करवाई थी। इसके निर्माण का वर्ष 1643 A. D. बताया जाता है।

​जहाँ आरा बेगम चिश्ती सिलसिले की एक बेहद अक़ीदतमंद (श्रद्धालु) मुरीद थीं। उनके द्वारा लिखी गई किताब 'मुनिस-उल-अरवाह' (Munis-ul-Arwah) ख्वाजा साहब के प्रति उनके गहरे सम्मान और भक्ति के भावों से भरी हुई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह किताब इस दलान के निर्माण के बारे में खामोश है।

जहाँ आरा ने दरगाह शरीफ के 'फ़र्राश खाना' और 'तोशाखाना' के लिए खादिम (सेवक) भी पेश किए थे। ​बेगमी दलान सफेद संगमरमर (white marble) से बना है। इसका फर्श भी सफेद संगमरमर का है, जिसमें जैसलमेर के दुर्लभ 'बिछिया' और 'हाबुर' पत्थर जड़े हुए हैं।

1888 A. D. में रामपुर के दिवंगत नवाब मुश्ताक अली खान द्वारा दिए गए पैसे से दलान की दीवारों और खंभों को सोने और चांदी के रंगों से रंगा गया था, और इसकी छत का काम बॉम्बे के एक मुस्लिम व्यापारी द्वारा करवाया गया था। असल में, यह दलान उस चौकोर गुंबद वाली इमारत का एक बरामदा (portico) है, जिसके अंदर ख्वाजा साहब का मज़ार-ए-अकदस मौजूद है।

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