राजस्थान सरकार मे यूडीएच मंत्री ख़र्रा की बेटी के विवाह में प्रोटोकॉल ध्वस्त करने का बेहूदा प्रदर्शन
✍️✍️✍️ श्याम पाराशर ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
जयपुर चौमू
गार्ड ऑफ ऑनर कोई सजावटी रस्म या निजी स्वागत का जरिया नहीं है; यह वह सर्वोच्च राजकीय और सैन्य सम्मान है जो देश की अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक माना जाता है। इसे एक निजी विवाह समारोह के शोर-शराबे और दावतों के बीच ले आना उस गरिमा का गला घोंटने जैसा है, जिसे केवल अत्यंत विशिष्ट आधिकारिक अवसरों के लिए सुरक्षित रखा गया है। जब दो-दो राज्यों के संवैधानिक प्रमुख एक निजी वैवाहिक कार्यक्रम में मेहमान बनकर आते हैं, तो वहां पुलिस की सशस्त्र टुकड़ियों द्वारा दी गई सलामी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या अब प्रशासन ने प्रोटोकॉल और सुरक्षा के बीच का अंतर भुला दिया है? या फिर सत्ता के दबाव में नियम-कायदों को मंत्रियों के घर की ड्योढ़ी पर गिरवी रख दिया गया है?
लोकतंत्र की मर्यादाओं को ताक पर रखकर जब सत्ता के रसूख का प्रदर्शन होता है, तो वह संवैधानिक मूल्यों का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी स्पष्ट अवमानना होती है। नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा की बेटी की शादी में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े और सिक्किम के राज्यपाल ओमप्रकाश माथुर की उपस्थिति के दौरान जिस तरह 'गार्ड ऑफ ऑनर' का तमाशा खड़ा किया गया, उसने प्रशासनिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। यह किसी राजकीय सम्मान का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सत्ता की चाटुकारिता और सरकारी संसाधनों की ऐसी नुमाइश है, जो सीधे तौर पर संवैधानिक गरिमा पर प्रहार करती है।
यह सरासर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग और सामंती मानसिकता का खुला प्रदर्शन है। एक निजी आयोजन को 'आधिकारिक' रंग देना न केवल जनता की गाढ़ी कमाई के संसाधनों का अपव्यय है, बल्कि यह उन उच्च पदों की निष्पक्ष छवि को भी धूमिल करता है जिनसे सादगी और नैतिकता की अपेक्षा की जाती है। यदि किसी मंत्री के पारिवारिक उत्सवों में राजकीय सम्मान की ऐसी ही बंदरबांट होती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब सार्वजनिक मर्यादाएं केवल किताबों का हिस्सा रह जाएंगी। यह घटना प्रशासनिक पतन की पराकाष्ठा है, जहाँ व्यक्तिगत रसूख को संवैधानिक मूल्यों से बड़ा मान लिया गया है।