"घर की 'अनदेखी मजदूरी' को मिला न्यायिक सम्मान"
दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,
विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार
भारत में करोड़ों गृहिणियाँ रोज सुबह से रात तक काम करती हैं —
खाना बनाना,
बच्चों को पालना,
घर सँभालना,
पति की दिनचर्या को व्यवस्थित करना।
लेकिन जब भी घर टूटता है, तो यही समाज और कई बार अदालतें भी पूछ बैठती हैं —
"आप तो 'खाली' बैठती थीं, नौकरी क्यों नहीं की?"
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सोच को जड़ से नकारते हुए एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि बिना नौकरी वाली पत्नी 'खाली' नहीं बैठती — घरेलू काम की अनदेखी 'अन्यायपूर्ण' है।
मामला क्या था?
दिल्ली की एक महिला की शादी 2012 में हुई थी। पति ने 2020 में उसे और नाबालिग बेटे को छोड़ दिया।
महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 CrPC के तहत अंतरिम गुजारा भत्ते की माँग की।
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह कहते हुए भत्ता देने से इनकार कर दिया कि पत्नी "स्वस्थ और शिक्षित है, उसने नौकरी न करने का विकल्प चुना।"
अपीलीय अदालत ने भी उसे राहत नहीं दी। पति का तर्क था कि पत्नी 'खाली' बैठकर गुजारा भत्ता नहीं माँग सकती।
मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच ने 16 फरवरी 2026 को दिए आदेश में कई ऐतिहासिक टिप्पणियाँ कीं:
"कमाने की क्षमता" और "वास्तविक कमाई" दोनों अलग-अलग हैं। केवल इस आधार पर कि पत्नी काम करने में सक्षम है, उसे मेंटेनेंस से वंचित नहीं किया जा सकता।
घरेलू काम, बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियाँ भी श्रम हैं — इनका आर्थिक महत्व है, भले ही इनका सीधा भुगतान न होता हो।
पत्नी का घरेलू कामकाज कमाने जा रहे जीवनसाथी को सपोर्ट देता है। बच्चों को पालना, परिवार का ख्याल, जीवनसाथी के करियर के लिए खुद को ढालना —
ये जिम्मेदारियाँ किसी बैंक खाते में नहीं दिखतीं, मगर इन्हीं के जरिए एक परिवार चलता है।
लंबे अंतराल के बाद तुरंत नौकरी मिलना आसान नहीं होता।
भारतीय समाज में शादी के बाद महिलाओं से नौकरी छोड़ने की अपेक्षा रखी जाती है, फिर उसी आधार पर गुजारा भत्ते से वंचित करना न्यायसंगत नहीं।
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट का फैसला पलटते हुए महिला को घरेलू हिंसा कानून के तहत ₹50,000 अंतरिम मेंटेनेंस दिलाया।
विश्लेषण
यह फैसला केवल एक मेंटेनेंस केस का नहीं है — यह उस सामाजिक पूर्वाग्रह पर सीधा प्रहार है जो वर्षों से गृहिणी के श्रम को "शून्य" मानता आया है।
भारत में GDP गणना में घरेलू श्रम को कभी नहीं जोड़ा जाता। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर गृहिणियों के काम को मुद्रा में आँका जाए, तो यह GDP का 30-40% तक हो सकता है।
एक कुक, नैनी, ड्राइवर, काउंसलर, टीचर, मैनेजर — गृहिणी ये सब एकसाथ होती है, और बिना वेतन के।
अदालत ने सही कहा — "कमाने की क्षमता" और "वास्तविक कमाई" में फर्क होता है। जो महिला वर्षों तक घर चलाती रही, पति के करियर की नींव बनती रही, बच्चों को पालती रही — उसे "निकम्मी" और "बोझ" कहना न केवल गलत है, बल्कि न्यायिक अन्याय भी है।
समाज और न्यायपालिका दोनों को यह समझना होगा कि पत्नी का घरेलू योगदान वैवाहिक साझेदारी का अभिन्न हिस्सा है। जब यह साझेदारी टूटती है, तो उस योगदान की कीमत चुकाए बिना आगे बढ़ना — न नैतिक है, न कानूनी।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला करोड़ों गृहिणियों के लिए एक न्यायिक सम्मान है। यह उन लाखों महिलाओं को आवाज देता है जिनका "काम" कभी गिना नहीं गया। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की यह टिप्पणी — "घरेलू काम की अनदेखी अन्यायपूर्ण है" — आने वाले समय में पारिवारिक कानून की दिशा तय करेगी।
एक सभ्य समाज वही है जो अपनी माताओं, पत्नियों और बेटियों के अदृश्य श्रम को पहचाने — कोर्ट की डाँट पड़ने से पहले।