धर्म या धंधा: पात्रता, पद और स्व-घोषित 'ईश्वरीय' संस्थाओं का संकट
धर्म या धंधा: पात्रता, पद और स्व-घोषित 'ईश्वरीय' संस्थाओं का संकट
आज के दौर में धर्म सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण विषय बन गया है। जिस धर्म को 'परम नैतिकता' और 'सत्य' का आधार होना चाहिए था, वह आज केवल बड़े-बड़े विशेषणों और व्यापारिक संस्थाओं का केंद्र बनकर रह गया है।
1. पात्रता बनाम पद: राजनीति और धर्म का अंतर
राजनीति विज्ञान में किसी भी पद के लिए एक निश्चित पात्रता (Eligibility) आवश्यक होती है। यदि कोई व्यक्ति बिना योग्यता या बिना आधिकारिक डिग्री के अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' या 'मंत्री' जैसे पद लगाता है, तो कानून उसे दंडित करता है।
किंतु धर्म के क्षेत्र में यह नैतिकता पूरी तरह लुप्त हो चुकी है। यहाँ कोई भी व्यक्ति, बिना किसी आंतरिक शोध या पात्रता के, स्वयं को:
संत, महात्मा, आचार्य या अलौकिक घोषित कर देता है।
यह न केवल समाज को भ्रमित करना है, बल्कि स्वयं धर्म की मर्यादा का अपमान है।
2. नैतिकता और पद की शोभा
पद की शोभा व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि उसकी विवेकशीलता, रणनीतिक समझ, सत्य के प्रति निष्ठा और धार्मिकता से होती है। धर्म में निर्णय 'स्व-सत्य' के बराबर होना चाहिए।
"यदि आप वह नहीं हैं जो आपने अपने पद के नाम से घोषित किया है, तो आप धार्मिक नहीं, बल्कि एक अपराधी हैं जो जनता की आस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं।"
3. स्व-घोषित 'ईश्वरीय' संस्थान: एक बड़ा प्रश्न
आज कई ऐसी संस्थाएं खड़ी हो गई हैं जो खुद को 'ईश्वरीय विश्वविद्यालय' (जैसे प्रजापति ईश्वरीय विश्व विद्यालय आदि) कहती हैं। यहाँ कुछ गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं:
इस विश्वविद्यालय को किस धर्म या वैदिक शास्त्र ने मान्यता दी है?
'ईश्वर का विश्वविद्यालय'—यह उपाधि किसने प्रदान की?
क्या ईश्वर को अपना संदेश देने के लिए ऐसी किसी व्यापारिक संरचना या ईंट-गारे की संस्था की आवश्यकता है?
बिना विवेक के ऐसी संस्थाएं खड़ा करना 'महापाप' की श्रेणी में आता है। यह धर्म नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर खड़ा किया गया एक 'कॉर्पोरेट बिजनेस' है।
4. धर्म, धंधा और सत्ता का गठजोड़
ईश्वर कौन है और तुम कौन हो? जब तक यह बुनियादी बोध नहीं होता, तब तक धर्म केवल एक धंधा बना रहेगा। आज धर्म को:
बिजनेस (Business): धन उगाही का साधन।
सत्ता (Power): भीड़ जमा कर प्रभाव दिखाने का जरिया।
भ्रम (Illusion): जनता को अलौकिक भय और लालच में रखने का तंत्र।
निष्कर्ष
धर्म विवेक का विषय है, भीड़ का नहीं। बिना पात्रता के पद धारण करना और बिना सत्य के संस्थाएं चलाना आध्यात्मिक दिवालियापन है। समाज को आज 'स्व-घोषित' महापुरुषों से बचकर अपने भीतर के विवेक और सत्य के संकेत को पहचानने की आवश्यकता है।
— अज्ञान की खोज में,
(अज्ञात अज्ञानी)
https://orcid.org/0009-0000-8083-0685