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पाताल की गहराई में सुरक्षित मेट्रो, पर स्मार्ट सिटी अजमेर के अंडरपास क्यों बने 'जल-समाधि'?

​कोलकाता/अजमेर: एक तरफ देश का गौरव कोलकाता मेट्रो है, जिसने हुगली नदी के नीचे 108 फीट की गहराई में इंजीनियरिंग का लोहा मनवाया है। दूसरी तरफ राजस्थान का हृदय 'अजमेर' है, जहाँ के रेलवे अंडरपास मानसून की पहली बारिश में ही सरकारी दावों की पोल खोल देते हैं। आज सवाल यह नहीं है कि हमारे पास तकनीक है या नहीं, सवाल यह है कि जो इंजीनियरिंग नदी का पानी रोक सकती है, वह अजमेर की सड़कों का पानी क्यों नहीं निकाल पा रही?
​कोलकाता मेट्रो: जहाँ मौत को मात देती है तकनीक
​कोलकाता का हावड़ा मैदान मेट्रो स्टेशन जमीन से 33 मीटर नीचे स्थित है। यहाँ 'हाइड्रोफिलिक गास्केट' नामक तकनीक का उपयोग किया गया है। यह एक ऐसा सुरक्षा कवच है जो पानी के संपर्क में आते ही सक्रिय हो जाता है और किसी भी रिसाव को शून्य कर देता है। यहाँ चौबीसों घंटे चलने वाले 'स्मार्ट सेंसर पंप' लगे हैं, जो पानी की एक बूंद को भी ठहरने नहीं देते।
​अजमेर का हाल: करोड़ों खर्च, फिर भी जनता बेहाल
​अजमेर में रेलवे और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बने अंडरपास—चाहे वह मदार हो, गुलाब बाड़ी या धौलाभाटा—बारिश के दिनों में तालाब बन जाते हैं।
​भ्रष्टाचार की 'सीपेज': सूत्रों का कहना है कि कोलकाता मेट्रो जैसी ही 'वॉटरप्रूफिंग' तकनीक का बजट इन अंडरपास के लिए भी आवंटित होता है, लेकिन धरातल पर घटिया कंक्रीट और पुरानी प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल कर खानापूर्ति कर दी जाती है।
​पंपों का 'मायाजाल': अजमेर के अधिकांश अंडरपास में पानी निकासी के लिए रखे गए पंप या तो चोरी हो जाते हैं, या एन वक्त पर खराब मिलते हैं। भारी भरकम बिजली बिलों और डीजल के नाम पर होने वाला भ्रष्टाचार जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
​इंजीनियरिंग की बड़ी चूक: अजमेर की भौगोलिक स्थिति को समझे बिना बनाए गए इन अंडरपासों में प्राकृतिक ढलान (Gradient) का अभाव है। विशेषज्ञों का मानना है कि ठेकेदारों ने लागत कम करने के चक्कर में ड्रेनेज सिस्टम को नजरअंदाज किया, जिसका खामियाजा आज आम आदमी भुगत रहा है।
​एक देश, दो तस्वीरें: क्यों है यह अंतर?
​कोलकाता मेट्रो एक केंद्रीय और उच्च-स्तरीय निगरानी वाला प्रोजेक्ट है, जहाँ एक इंच की गलती भी बर्दाश्त नहीं की जाती। इसके विपरीत, अजमेर के स्थानीय रेलवे अंडरपास भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी का शिकार हैं। यहाँ फाइलें तो पास हो जाती हैं, लेकिन सड़क पर पानी 'पास' नहीं हो पाता।
​निष्कर्ष: कब खुलेगी प्रशासन की आंखें?
​कोलकाता का 'हावड़ा मैदान' स्टेशन चीख-चीख कर कह रहा है कि "भारत के पास तकनीक की कमी नहीं है।" अगर कमी है, तो वह है ईमानदारी और जवाबदेही की। जब तक छोटे प्रोजेक्ट्स में ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक अजमेर की जनता टैक्स भरने के बाद भी तैरकर सड़क पार करने को मजबूर रहेगी।
​आज का सवाल: अगर हम नदी के नीचे ट्रेन चला सकते हैं, तो क्या हम एक अंडरपास को सूखा नहीं रख सकते? या फिर ये 'पानी' भ्रष्टाचार की कमाई का जरिया बन चुका है?

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