हिंदू धर्म और आदि गुरु शंकराचार्य जी , वर्तमान, भूत और भविष्यते...
जानिए उनके जयंती पर उनके मन और सोच के अंदर के गहराई को जो सनातन धर्म को महान बनाता है।
केरलम के कालड़ी ग्राम मे, जन्मे आदि शंकराचार्य, सनातन धर्म के ऐसे स्तंभ हैं जो केवल तर्कों से ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की पैदल यात्रा कर संवाद और शास्त्रार्थ के माध्यम से सनातन धर्म को एक नई ऊर्जा प्रदान की। इसलिए वे अध्यात्म के आकाश में एक दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह है। उन्होंने न केवल हिंदू धर्म को पुनर्जीवित किया, बल्कि अद्वैत वेदांत के सिद्धांत के माध्यम से ईश्वर, जीव और प्रकृति के अंतर्संबंधों को एक नई परिभाषा दी और प्रेम अनुराग से उसको सिद्ध कर मानव जीवन के कल्याण के लिए मार्ग भी प्रशस्थ किया। इसलिए शंकराचार्य का सबसे बड़ा योगदान 'अद्वैत' का दर्शन है। जिसमें उन्होंने एक सूत्र दिया..
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः"
(ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या या परिवर्तनशील है, और जीव वास्तव में ब्रह्म से अलग नहीं है।)
उन्होंने कहा था कि अज्ञानता (माया) के कारण हमें स्वयं और ईश्वर के बीच भेद दिखाई देता है। ज्ञान के माध्यम से इस भेद को मिटाना ही मोक्ष है। यह सुविचार उन्होंने (788–820 ईस्वी) के बीच में दिया था जो आज तक प्रासंगिक है।
यही नहीं उन्होंने चार मठों की स्थापना किया जो भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता को सुदृढ़ करने में आज भी अहम योगदान देती है वे है उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम, उत्तराखंड),दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा) और पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (गुजरात) है । इसी से उन्होंने उस समय व्याप्त विभिन्न धार्मिक मतभेदों को दूर कर 'पंचायतन पूजा' (पांच देवताओं की पूजा) को बढ़ावा दिया, जिससे शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश और सूर्य के उपासकों में एकता बनाने में सफल रहे। और उन्होंने संन्यासियों को दस श्रेणियों (जैसे- पुरी, भारती, गिरि आदि) में संगठित किया ताकि वे धर्म की रक्षा हो सकें।
इसलिए उन्होंने मात्र 32 वर्ष की आयु में साहित्य रचा किया, जो आज भी दार्शनिकों के लिए मील का पत्थर है। जो निम्न है ।
प्रस्थानत्रयी भाष्य: उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर उनकी विस्तृत व्याख्याएं।
स्तोत्र रचना: उन्होंने 'भज गोविंदम्', 'सौंदर्य लहरी' और 'निर्वाण षट्कम' जैसे अत्यंत भक्तिपूर्ण और दार्शनिक स्तोत्रों की रचना की।
विवेक चूड़ामणि: यह ग्रंथ आत्म-साक्षात्कार के मार्ग का विस्तार से वर्णन करता है।
इसलिए उनकी रचना "निर्वाण षट्कम' के कुछ पक्तियों में उन्होंने कहा है कि...(न मुझे द्वेष है न राग, न लोभ है न मोह; न मुझे गर्व है न ईर्ष्या। न मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के बंधनों में हूँ। मैं चैतन्य रूप हूँ, मैं शिव हूँ।)
इसलिए ब्रह्मांड और लोक का सार और सनातन धर्म की इसी पर आधारित सुविचार, सभी जीवो में कल्याण करी भाव जागृत कर, एक शांति, सदभाव तथा ज्ञान के मार्ग पर चलने के लिए सदैव ही प्रेरित करता है।
इसलिए सनातनी स्व आदि शंकराचार्य के बारे में सबकुछ तो नहीं, पर कुछ संक्षिप्त में बताने के कोशिश किया हु जिससे उनके जयंती पर गर्व से सनातनी कहने में अति गर्व की अनुभूति होगी।
इसलिए उनको कोटि कोटि नमन करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने केदारनाथ (उत्तराखंड) में अपनी देह का त्याग किया।
सप्रेम धन्यवाद
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