उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, मेरठ और मुजफ्फरनगर जिलों में प्रस्तावित “कांवड़ कॉरिडोर” परियोजना को लेकर पर्यावरण और विकास के बीच टकराव तेज हो गया है।
लखनऊ मेरठ कांवड़ यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गाजियाबाद, मेरठ और मुजफ्फरनगर को जोड़ने वाला करीब 111 किलोमीटर लंबा कांवड़ कॉरिडोर बनाया जा रहा है। इस परियोजना के तहत 33,000 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ों को काटने की योजना है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस परियोजना के लिए अब तक लगभग 17,607 पेड़ों की कटाई की जा चुकी है, जबकि हजारों पेड़ों को चिन्हित किया गया है।
परियोजना का उद्देश्य
सरकार का कहना है कि—
कांवड़ यात्रा के दौरान भारी भीड़ और ट्रैफिक जाम को कम करना
श्रद्धालुओं के लिए अलग और सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना
हर साल करोड़ों कांवड़ियों की सुविधा बढ़ाना
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह मार्ग हर साल करीब 1 करोड़ श्रद्धालुओं के उपयोग में आता है।
पेड़ों की कटाई पर विवाद
इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ा विवाद पेड़ों की कटाई को लेकर है:
33,000 से अधिक बड़े पेड़ों को काटने की योजना
कुछ रिपोर्ट्स में कुल स्वीकृति 1.12 लाख पेड़/पौधे काटने तक की भी बताई गई है
पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे क्षेत्र का इकोलॉजिकल बैलेंस बिगड़ सकता है
NGT की दखल
मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुंच चुका है।
NGT ने सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी
पर्यावरणीय नियमों के पालन पर सवाल उठाए
परियोजना की निगरानी जारी है
सरकार का पक्ष
सरकार ने अपने पक्ष में कहा है कि—
क्षतिपूरक वृक्षारोपण (Compensatory Plantation) किया जाएगा
CAMPA फंड में धन जमा किया गया है
वैकल्पिक क्षेत्रों में नए पेड़ लगाए जाएंगे
पर्यावरणीय चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार:
इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से तापमान वृद्धि और प्रदूषण बढ़ सकता है
स्थानीय जैव विविधता (Biodiversity) पर असर पड़ेगा
जलवायु परिवर्तन के दौर में यह कदम चिंताजनक है
निष्कर्ष
कांवड़ कॉरिडोर परियोजना एक तरफ जहां धार्मिक और यातायात सुविधा को बेहतर बनाने की कोशिश है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास की बहस को भी तेज कर रही है।
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाती है और NGT के निर्देशों के बाद इस परियोजना में क्या बदलाव किए जाते हैं।