कुष्ठ रोगियों का सहारा रहा अस्पताल अब खुद 'बीमार'
Written by Mahesh Mishra
संताल पहाड़िया सेवा मंडल : खंडहर में तब्दील होता करोड़ों का कुष्ठ अस्पताल
करीब तीन दशक पहले इस इलाके में शिक्षित व स्वस्थ्य समाज का दूसरा नाम संताल पहाड़िया सेवा मंडल था। बच्चों के जन्म लेने से लेकर उसके पालन-पोषण के लिए अस्पताल, बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के लिए पहाड़िया पाठशाला हुआ करता था। कुष्ठरोगियों के इलाज में यहां न सिर्फ अविभाजित बिहार के रोगी, अपितु आसपास के कई प्रांतों के मरीज भी आकर स्वास्थ्य लाभ लेते थे। वक्त कब और कैसे बीत गया यह पता ही नहीं चला।
संताल पहाड़िया सेवा मंडल द्वारा संचालित कुष्ठ अस्पताल पिछले 32 साल से बंद पड़ा है। रखरखाव के अभाव में करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो रही है। इस अस्पताल में कार्यरत कर्मियों को पिछले करीब तीन दशक से वेतन नहीं दिया गया है।
सेवा मंडल के अधीन पूर्व में देवघर, मधुपुर, अमड़ापाड़ा, पालोजोरी, फतेहपुर, हंसडीहा, गोडडा, चांदवा, बोरियो आदि जगहों में कुष्ठ आश्रम संचालित था। इन आश्रमों में काफी चहल-पहल रहती थी। बिहार, यूपी, बंगाल, मध्य प्रदेश, झारखंड के रोगी यहां इलाज के लिए पहुंचते थे। पूर्व में इन अस्पतालों में तकरीबन 250 कर्मी पदस्थापित थे।
सेवा मंडल की ओर से विभिन्न स्थलों में पूर्व में छह मध्य विद्यालय, तीन उच्च विद्यालय, 160 प्राथमिक विद्यालय एवं 60 पहाड़िया पाठशाला चलाया जाता था। समय के साथ इनका अस्तित्व समाप्त हो गया।इस कुष्ठ आश्रम का उद्घाटन 22 नवंबर 1963 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सुशीला ने किया था। वर्ष 1994 तक अस्पताल में काफी रौनक रही।
यहां पर रोगियों के इलाज के साथ साथ पुनर्वास की भी मुकम्मल व्यवस्था थी। रोगियों को रेडियो, घड़ी मरम्मत के अलावे सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण मिलता था। साथ ही इसके नेतृत्व में कई गांवों में खादी ग्रामोद्योग तथा अलग-अलग जगहों पर कोकुन पालन और तसर उत्पादन भी किया जाता था।
कालांतर में संस्था में मतभेद से विवाद शुरू हो गई और तब से ही इसके बुरे दिन की शुरूआत हो गई। विवाद के बाद इसका मामला न्यायालय पहुंचा। अदालत ने तत्कालीन उपायुक्त को संताल पहाड़िया सेवा मंडल का रिसीवर नियुक्त कर दिया। साथ ही जनहित में कुष्ठ निवारण और विकलांगता निवारण जैसे बंद पड़े कार्यों को भी प्रारंभ करने का निर्देश दिया।
तत्कालीन उपायुक्त बैद्यनाथ प्रसाद ने आश्रम के संचालन के लिए एक कमेटी का गठन किया। जिसमें उपायुक्त, उप विकास आयुक्त, रोटरी व लायंस क्लब के अध्यक्षों को सदस्य बनाया गया। इस दौरान कर्मियों को सात माह का वेतन भी दिया गया था। इस बीच तत्कालीन उपायुक्त का स्थानांतरण हो गया और झारखंड राज्य अलग होने के बाद अब तक किसी उपायुक्त की नजर इस अस्पताल पर नहीं पड़ी। इसके बाद इस भवन में कभी स्पीड कार्यालय तो कभी केन्द्रीय विद्यालय चला, परंतु अस्पताल शुरू नहीं किया गया।
जानकारी हो कि इस आश्रम में करोड़ों की अचल बर्बाद हो गई। कई विदेशी एक्सरे मशीन से लेकर अन्य उपकरणों की या तो चोरी हो गई या रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो गया। सरकार एक ओर नये अस्पतालों के निर्माण और चिकित्सा मद में प्रत्येक वर्ष करोड़ों की राशि खर्च कर रही है। वहीं, दूसरी ओर करोड़ों का अस्पताल और उपकरण बर्बाद हो रहा है। लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
वर्तमान में न्यायालय द्वारा संताल पहाड़िया सेवा मंडल को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिया है लेकिन वर्तमान में मधुपुर के आश्रम की यथावत स्थिति है।