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रामपूर के भवनों किताबों के जखीरे और संगीत के नौ रत्नों से लेकर अपनी रेल अपने बिजली घर और उधोगो ने रामपूर के इस छोटे से राज्य को पुरे देश में बढा और मह

रामपुर के नवाबों को खुबसूरत इमारतें बनवाने और किताबें जमा करने का ही शौक नहीं था वह संगीत में भी दिलचस्पी रखते थे जिस तरह उनके जखीरे में बेशुमार अनमोल किताबें हैं रामपूर में उनके तामीर कराएं खुबसूरत भवन रामपुर में है उसी तरह उनके दरबार में संगीत के भी नौ रत्नों कि कोई कमी देखने को नहीं मिलती है वैसे तो रामपूर स्टेट का शुमार बहुत छोटी स्टेटो में होता था लेकिन नवाबी शौक और दिलचस्पी के चलते रामपूर के भवनों किताबों के जखीरे और संगीत के नौ रत्नों से लेकर अपनी रेल अपने बिजली घर और उधोगो ने रामपूर के इस छोटे से राज्य को पुरे देश में बढा और महान राज्य बना दिया था रामपूर रज़ा लाइब्रेरी के किताबी जखीरे को पढ़ा जाए तो रामपूर स्टेट की बुलंदी का पता चलता है चलो आज रामपुर दरबार के संगीतकार बहादुर हुसैन ख़ाँ और संगीत की बात करते हैं रामपुर दरबार के संगीतज्ञों के बारे में लिखने से पहले ये जान लेना भी ज़रूरी है कि 1774 में रियासत रामपुर आबाद हुई थी, जिसके पहले नवाब फैज़ुल्लाह खाँ के पिता नवाब अली मुहम्मद ने सारे कठेर पर अधिकार करके आँवले को राजधानी बनाया था। वे दिल्ली दरबार के मंसबदार थे इसी नाते तानसेन और मिसरी सिंह के वंशज आँवला, उझानी, सहसवान, अतरछींडी और टाँडे में आते-जाते रहते जहाँ के जागीरदार नवाब अली मुहम्मद ख़ाँ के पुत्र नवाब अब्दुल्लाह ख़ाँ, नवाब सादुल्लाह ख़ाँ और नवाब मुहम्मद यार ख़ाँ थे। इस सिलसिले में पहले लिखा जा चुका है। ये कलाकार नादरशाह दुर्रानी के आक्रमण (1739) के बाद दिल्ली छोड़कर अन्य सूबाई राज्यों में चले गये थे। संगीतकारों का दूसरा पलायन उस वक्त शुरू हुआ जब 1856 में अवध और 1857 में दिल्ली बर्बाद हुआ।बहादुर हुसैन ख़ाँ रामपुर आने से पहले अवध के नरेश नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में थे। नवाब ने उन्हें 'ज़ियाउद्दौला' का ख़िताब देकर सम्मानित किया था। जब 1856 में अवध पर अंग्रेज़ो ने अधिकार कर लिया तो कुछ संगीतकार रियासत रामपुर में आ गये, कुछ बनारस और बंगाल चले गये।उस समय उत्तरी भारत में रियासत रामपुर ही ऐसी जगह थी जिसे रामपुर के नरेश नवाब यूसुफ़ अली खाँ ने कूटनीति से अंग्रेज़ो और विद्रोहियों के हाथों बर्बाद होने से बचा लिया था। उन्हें शायरी और संगीत से लगाव था। उन्होंने बहादुर हुसैन ख़ाँ को बड़े सम्मान से, अवध से रियासत रामपुर आने का निमन्त्रण दिया। आने से पहले नवाब यूसुफ़ अली ख़ाँ और बहादुर हुसैन ख़ाँ में ये मौसादा हुआ कि उनके निधन के बाद 'तक़र्रूबे एज़ाज़'(विशेष संबंध) नाम से उनके उत्तराधिकारियों को वज़ीफा मिलता रहेगा जो उनके बाद भी 200 रूपया प्रति माह मिलता रहा।
बहादुर हुसैन ख़ाँ 26 अप्रैल 1857 को रामपुर आये। बज़रिया मुल्ला ज़रीफ़ (जहाँ अब पुलिस चौकी है) में 600 गज़ में बना मकान रहने को दिया गया। डूंगरपुर में पुलिस लाईन के सामने- बाग़ दिया गया।
तीन सौ रुपया महीना मुक़र्रर हुआ और पालकी सवारी में दी गई जो उनके सम्मान की प्रतीक है। बहादुर हुसैन खां के कोई औलाद नहीं थी। एक लेपालक को पाल लिया था। बाद में उसी को मकान दे दिया था। बाद में अमीर खां के निधन के बाद उस्ताद मुहम्मद वज़ीर खां बीनकार को गोद ले लिया था। वो स्वयं भी प्यारे खां के गोद लिए बेटे थे और अमीर खां के ममया ससुर थे। उस ज़माने में हिन्दुस्तान में बहादुर हुसैन खां, सादिक़ अली खां, क़ासिम अली खां (जो नेमत खां के शागिर्द थे) और अली मुहम्मद खां (बड़कू मियां) के गायन वादन का डंका बज रहा था इसीलिये नवाब यूसुफ़ अली खां ने उनको सम्मान के साथ बुलाया था। बहादुर हुसैन खां प्यार खां के भांजे और गोद लिए बेटे थे। आपने सुरसिंगार की शिक्षा प्यार खां से पाई थी। आप "मियां मनरंग के परपोते और सदारंग के सरपोते थे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सदारंग के वंशज दिल्ली से आकर रामपुर में ही बस गए थे।" नवाब यूसुफ अली खां के निधन (1865) के बाद उनके पुत्र नवाब कल्बे अली खां (1865-1887) के गुरु हो गये और 350 रुपया महीना पाने लगे। इस समय अमीर खां भी रामपुर में आ गये जो बहादुर हुसैन खां की भानजी के पति थे। दोनों एक ही वंश से थे। बहादुर हुसैन खां सुरसिंगार और रबाब बजाते थे और अमीर खां धुरपद गाते थे। अमीर खां की आवाज़ बड़ी सुरीली थी। जब बहादुर हुसैन खां सुरसिंगार बजाते और उनके साथ अमीर खां गाते तो उनकी सुरीली आवाज सुरसिंगार वादन में चार चांद लगा देती। ये वो ज़माना था जबकि बहादुर हुसैन खां वाद्य यंत्र संगीत और अमीर खां कण्ठ संगीत में सारे हिंदुस्तान में बुलंदी पर थे।रामपुर के 'मेला बेनज़ीर' की संगीत सभा में इन दोनों ने गाया बजाया था जिसका वर्णन जलाल लखनवी ने इस तरह किया है-
है बहादुर हुसैन खां के सबब
बारबद पर भी बेखुदी तारी
ख़त्म इन पर है सुरसिंगारो रबाब
हाथ के क़ब्ज़े में है तैयारी
अमीर खां के ध्रुवपद गायन और वीणा वादन की प्रशंसा करते हुये 'जलाल' कहता है कि ध्रुवपद वादन में इन की बराबरी करने वाला कोई नहीं है और इनकी बीन (वीणा) सुनकर श्रोता होशोहवास इस तरह खो देते हैं जैसे उन पर जादू कर दिया हो--
धुरपतों में अमीर खां यकता
बीनकारी में भी फुसूँ कारी
अमीर खां अपने समय के तंतकार और गायक थे। उनका इंतेकाल (निधन) जनवरी 1879 में रामपुर में हुआ और अपने बाग़ (डूंगरपुर) से आधे मील के फासले पर दफ़न हुये।संगीत के अलावा शायरी का भी शौक था। दरबार के बड़े-बड़े शायर- दाग़ देहलवी, अमीर मीनाई, अमीररुल्लाह तसलीम, जलाल लखनवी, मुनीर शिकोह आबादी और कवियों ग्वाल, बलदेव दास तिवारी और विद्वानों पंडित दत्त राम (आचार्य बृहस्पति के दादा) से घनिष्ठ संबंध थे।बहादुर हुसैन खां द्वारा रचित बहुत सी बंदिशों, तराने और सरगमें प्रसिद्ध हैं। इनकी चीज़ों में सुर व लय का आनन्द प्राप्त होता है-- यहाँ तक कि सन्दपिया की जो ठुमरियाँ प्रचलित हैं वे बहादुर हुसैन खां की ही रचनाओं पर आधारित हैं। इन ठुमरियों में वही सुर तथा लय वैचित्रय का अनोखापन है।उस युग के इतिहासकार केवल हुक्मरानों से संबंधित राजनीतिक हालात लिखा करते थे इसलिये उस युग के संगीतकारों के हालात और वाकेआत नहीं मिलते। कहीं कहीं नाम ज़रूर मिल जाते हैं इसलिये सीमित जानकारी के सहारे केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।रामपुर स्टेट गज़ट और अन्य शहरों, विशेषकर अवध ओर बंगाल में लिखे गये 'तज़करों' के आधार पर बहादुर हुसैन ख़ाँ के शिष्यों के नाम इस प्रकार मिलते हैं:-
1 इनायत हुसैन ख़ाँ गायक सहसवान वाले 2- मुहम्मद हुसैन बीनकार 3- साहबज़ादा हैदर अली ख़ाँ 4- नवाब यूसुफ़ अली ख़ाँ
5- नवाब कल्बे अली ख़ाँ 6- गुलाम नबी ख़ाँ बीनकार 7- मजरू ख़ाँ सरोद वादक
8- अहमद अली खाँ सरोद वादक (मजरू ख़ाँ के भतीजे)। अहमद अली ख़ाँ महाराजा दीनाजपुर के दरबारी थे। बंगाल के संगीत रसिक अहमद अली ख़ाँ को बहुत चाहते थे।
9- असद ख़ाँ ख़याल गायक और सरोद वादक बहादुर हुसैन ख़ाँ के बारे में दो घटनाएँ बड़ी मशहूर हैं। कहा जाता है कि उन्होंने साहबज़ादा हैदर अली ख़ाँ से लाखों रूपया लेकर उन्हें तानसेन परम्परा के संगीत के रहस्यों को बताया था। एक योग्य शिष्य होने के नाते हैदर अली ख़ाँ ने सेनी-परम्परा की तालीम को सीख लिया था और इस योग्य बन गये थे कि उस युग के महान कलाकार भी उनसे तालीम हासिल करने बिसौली आने लगे थे। जब बहादुर हुसैन ख़ाँ ने उन्हें योग्य संगीतकार मान लिया तो उनका दिया हुआ लाखों रूपया वापस करके कहा- "हमारे वंश में तालीम पैसे से बेची नहीं जाती।" दूसरी घटना का सारांश इस प्रकार है कि बहादुर हुसैन ख़ाँ का बज़रिया मुल्ला ज़रीफ़ का मकान ग्राम डूंगरपुर से क़रीब था। देहात के लोग इसी रास्ते से सूर्योदय से पूर्व अनाज की बैलगाड़ियाँ शहर में लाते थे। ये समय बहादुर हुसैन ख़ाँ के रियाज़ का होता था। उनके सुरसिंगार या रबाब की मधुर आवाज़ सुनकर गाड़ियाँ रूक जाती थीं। गाड़ी के बैल आगे चलना बंद कर देते थे। संगीत के सच्चे सुरों के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। ये घटना इस सच्चाई का भी प्रमाण है कि बेजू और तानसेन के संगीत से संबंधित घटनाएँ सच्ची हैं।

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