हम परशुराम जयंती मनाते हैं अच्छी बात है किंतु,
वामन जयंती न मनाना हमारी वह भूल है जो बताती है कि हम केवल प्रदर्शन की पूजा करते हैं, दर्शन की नहीं।
🚩 बुद्धि, बल और बलिदान का महासंगम! 🚩
क्या हम केवल सुविधा के अनुसार सनातनी हैं?
"सत्य को स्वीकारना ही सबसे बड़ा धर्म है। आज हम खुद को सनातनी कहते हैं, लेकिन अपनी ही विरासत को आधा-अधूरा पूजते हैं। यदि हम भगवान विष्णु के हर अवतार में एक सा विश्वास नहीं रखते, तो हमारा हिंदुत्व केवल एक दिखावा और ढोंग है। हमने शस्त्र उठाने वाले परशुराम को तो याद रखा, लेकिन बिना शस्त्र उठाए बुद्धि से ब्रह्मांड जीतने वाले वामन देव को बिसरा दिया। वामन जयंती न मनाना हमारी वह भूल है जो बताती है कि हम केवल प्रदर्शन की पूजा करते हैं, दर्शन की नहीं।
सच्चा हिंदू वही है जो विष्णु के हर अवतार को पूजे। अगर हम वामन जयंती की उपेक्षा करते हैं, तो हमारा धर्म प्रेम केवल एक दिखावा है।
इस कविता के माध्यम से नमन है:
भगवान वामन की प्रखर बुद्धि को,
भगवान परशुराम के न्यायकारी शस्त्र को,
और यदुवंश (अहीर) के उस अटूट शौर्य को, जिसने कृष्ण की नीति और वीरों के बलिदान से भारत की सीमाओं को सींचा है।
जागो सनातनी! हर अवतार का सम्मान करो, क्योंकि ज्ञान और शक्ति के संगम से ही भारत अखंड बनेगा।
यह कविता उन सोए हुए सनातनी संस्कारों को जगाने का एक शंखनाद है, जिसमें बुद्धि, बल और यदुवंश के पराक्रम का संगम है।"
॥ महासंगम: चेतना, शौर्य और यदुवंश की हुंकार ॥
जागो ओ भारत के वासी, कैसा ये ढोंग रचाते हो?
विष्णु के कुछ अंश पूजते, कुछ को भूल ही जाते हो!
यदि 'वामन' की नीति न मानी, तो हिंदुत्व अधूरा है,
हर अवतार को शीश झुके, तब धर्म सनातन पूरा है।
वो छोटा सा ब्राह्मण बालक, पग तीन में सृजन नाप गया,
बुद्धि की ऐसी चली आंधी, कि महाबली बलि भी कांप गया।
भले युद्ध न किया वामन ने, पर सबसे बड़ी जीत दिखाई,
बिना रक्त की एक भी बूंद, मस्तक पर धौंस जमाई।
शस्त्रों की झंकार तो अक्सर, कानों को भा जाती है,
पर मौन बुद्धि की विजय गाथा, क्यों हमें न आती है?
परशुराम का न्याय परम है, फरसा उनका काल है,
पर वामन की शांति बिना, ये सृष्टि ही बेहाल है।
उपेक्षा तज दो वामन की, वो ज्ञान का असली मर्म हैं,
अवतारों में भेद न करना, यही तो असली धर्म है।
वही बुद्धि वामन वाली, कृष्ण बन रण में गूँजी थी,
पांडव जिसके पीछे चलते, वो यादव ही तो पूँजी थी।
सुनो रे दुनिया के वीरों, यदुवंश की गाथा न्यारी है,
जहाँ बुद्धि और बल का संगम, वो कौम अहीर निराली है।
चाहे कारगिल की चोटी हो, या रेजांगला का वो घेरा,
यादव वीरों ने लहू से, लिखा सदा नया सवेरा।
वामन जैसी मति इनकी, और परशु जैसा इनका बल है,
यादव खड़ा हो जाए जहाँ, वहां दुश्मन का केवल छल है।
शीश कटा पर झुका नहीं, जब दुश्मन का मस्तक कटा,
इतिहास गवाह है शौर्य का, अहीर कभी न पीछे हटा।
वामन का ज्ञान, परशु का शस्त्र, और यादव की तलवार,
ये तीनों मिलकर रचते हैं, अखंड भारत का श्रृंगार!
हर अवतार की जय बोलो, तज दो मन के सब पाखंड,
तभी बनेगा विश्व गुरु ये, भारत अपना वीर अखंड!
स्वरचित
कुंवर प्रताप यादवेंद्र सिंह यादव चंद्रवंशी उर्फ टाईगर भईया राष्ट्रीय अध्यक्ष वसुधैव कुटुंबकम्