झारखंड के शिक्षा व्यवस्था की बदहाली: 14 जिलों में शिक्षकों के 15 हजार से अधिक पद खाली, 2146 स्कूल महज एक शिक्षक के भरोसे
गढ़वा। झारखंड के सरकारी स्कूलों में बुनियादी शिक्षा की नींव दरकती नजर आ रही है। दैनिक भास्कर की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 14 जिलों में शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, इन जिलों में शिक्षकों के कुल 15,452 पद खाली पड़े हैं।
एक शिक्षक के कंधों पर पूरे स्कूल का भार
सबसे चिंताजनक स्थिति उन 2,146 स्कूलों की है, जहां पूरे विद्यालय का संचालन केवल एक शिक्षक कर रहा है। ऐसी स्थिति में शिक्षक के विभागीय कार्यों में व्यस्त होने या छुट्टी पर होने पर बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर तो स्थिति इतनी खराब है कि एमडीएम (मिड-डे मील) खिलाने के बाद बच्चों को घर भेज दिया जाता है।
मुख्य जिलों की स्थिति पर एक नजर:
शिक्षकों की कमी के मामले में पलामू और चतरा जैसे जिले सबसे आगे हैं:
पलामू: 4,000 पद खाली (349 स्कूल एक शिक्षक के भरोसे)
सरायेकला: 2,643 पद खाली
गिरिडीह: 1,500 पद खाली
गढ़वा और लातेहार: यहां भी स्थिति दयनीय बनी हुई है, जहां विज्ञान और गणित जैसे महत्वपूर्ण विषयों के प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव है।
विषय विशेषज्ञों की कमी से पढ़ाई प्रभावित
स्कूलों में विज्ञान, गणित और समाजशास्त्र जैसे मुख्य विषयों के प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं। स्थिति यह है कि हिंदी या अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षक ही विज्ञान की कक्षाएं लेकर कोरम पूरा कर रहे हैं। इसका असर छात्रों के शैक्षणिक स्तर पर दिख रहा है—रिपोर्ट बताती है कि दसवीं के कई छात्र पांचवीं कक्षा के गणित के सवाल हल नहीं कर पा रहे हैं।
अभियान बनाम हकीकत
सरकार 'स्कूल रूआर' (बैक टू स्कूल) जैसे अभियान चलाकर बच्चों को स्कूल से जोड़ने का प्रयास तो कर रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि जब स्कूल में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो ये बच्चे पढ़ेंगे क्या?
अधिकारियों का पक्ष
जिले के शिक्षा अधिकारियों (DSE) का कहना है कि हर माह शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं जिससे रिक्तियां बढ़ रही हैं। वर्तमान में शिक्षकों को एक स्कूल से दूसरे स्कूल में 'प्रतिनियोजन' (Deputation) पर भेजकर काम चलाया जा रहा है। विभाग का दावा है कि सरकार से नई नियुक्तियों की मांग की गई है।
निष्कर्ष: राज्य में जब तक शिक्षकों की स्थाई नियुक्ति नहीं होती, तब तक बेहतर शिक्षा का सपना महज कागजी अभियानों तक ही सीमित रहेगा।