शीर्षक TMH में गरीब मरीजों की बिल माफी पर उठा सवाल, जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप से मिल रही राहत
जमशेदपुर शहर के प्रतिष्ठित अस्पताल Tata Main Hospital (TMH) में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के इलाज और बिल माफी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। जनप्रतिनिधियों ने अस्पताल प्रबंधन के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि वास्तविक स्थिति उतनी सरल नहीं है, जितनी प्रस्तुत की जा रही है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अस्पताल में रोज़ाना कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां गरीब मरीजों के भारी-भरकम बिल माफ कराने के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करना पड़ता है। उनका दावा है कि कई महीनों तक बिल माफी की प्रक्रिया रुकी रही, यह कहकर कि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड की निर्धारित सीमा पहले ही पूरी हो चुकी है।
हालांकि, इसके बावजूद कई गंभीर और मानवीय मामलों में जनप्रतिनिधियों के दबाव और प्रयास के बाद ही मरीजों को राहत मिल पाई। कुछ मामलों में तो स्थिति इतनी संवेदनशील थी कि बिल माफी के बाद ही मृतक के शव को अस्पताल से रिलीज कराया जा सका। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि ऐसी परिस्थितियों में मानवीय आधार पर सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि अस्पताल प्रबंधन अपने स्तर पर सभी जरूरतमंदों की सहायता कर रहा है। उनका आरोप है कि जमीनी हकीकत यह है कि लगातार दबाव और हस्तक्षेप के बाद ही कई परिवारों को राहत मिलती है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी संस्था या प्रबंधन को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि आम जनता को उनका अधिकार दिलाना है। जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं और आगे भी इसी तरह काम करते रहेंगे।
मामले को कानूनी और सामाजिक दायित्व से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि Companies Act, 2013 की धारा 135 के तहत CSR खर्च अनिवार्य है। इसके अनुसार योग्य कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2% सामाजिक कार्यों पर खर्च करना होता है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं में सहायता देना कंपनियों की जिम्मेदारी है, न कि कोई एहसान।
इसके साथ ही यह भी मुद्दा उठाया गया कि जिस जमीन पर TMH संचालित हो रहा है, वहां सरकार को प्रतीकात्मक रूप से बेहद कम टैक्स दिया जाता है। ऐसे में समाज के प्रति जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि कंपनियां अपने सामाजिक और कानूनी दायित्वों का पालन नहीं करती हैं, तो वे आवाज उठाते रहेंगे और जनता का हक दिलाने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ एक अस्पताल या बिल माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कॉर्पोरेट जिम्मेदारी, सरकारी नीति और आम जनता के अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और अधिक बहस और कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।