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​मगही माटी के महक अउर 'अन्तः सलिला' के ज्ञान-धार



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

​मगध के धरती ओई उपजाऊ माटी हे, जइजा सिर्फ फसल ना, बल्कि शब्द अउर संवेदना के "कलमकार" उपजे हथ। हाल ही में वरिष्ठ साहित्यकार विजय कुमार दत्त जी के संस्मरण पढ़ला पर ई बात फेर से साबित हो गेल कि साहित्य के सेवा करे वाला लोग के बीच जे आदर अउर स्नेह हे, उहे आज के दौर में असल पूँजी हे।
​1. गया जी के साहित्यिक विरासत
​लेख में 'अन्तः सलिला' स्मारिका के चर्चा भेल हे। गया जी के हिंदी साहित्य सम्मेलन अउर ओइजा के विद्वान लोग, जइसे डॉ. राधानन्द सिंह, मगध के इतिहास के सिर्फ लिखलखिन ना हे, बल्कि ओकरा जीवंत रखलखिन हे। द्वापर से कलयुग तक के कवि-साहित्यकारन के विवरण जुटाना कवनो तपस्या से कम न हे। ई दस्तावेज आवे वाला पीढ़ी ला एगो "सांस्कृतिक टॉर्च" के काम करत।
​2. दुगो कवि-मन के मिलन
​जब परिखा बाबू, विजय जी के घरे पहुँच के 'बाबा' कह के संबोधन करे हथ, त ओइजा ऊंच-नीच अउर ओहदा के दीवार ढह जाए हे। परिखा बाबू के अपन झोला से स्मारिका निकालल अउर विजय जी के ओकरा स्पर्श मात्र से सुकून मिलल, ई देखावे हे कि एगो सच्चा लेखक ला "शब्द" से बढ़ के कवनो दूसरा धन ना होवे हे।
​3. टमटम अउर जीवन के दर्शन
​विजय जी के उपमा देवे के अंदाज देखिये— "जईसे चलते टमटम, एकवान एके चाबुक मे हओ... होजा हे।" ई ठेठ मगही अंदाज बतावे हे कि साहित्य जब सही हाथ में आवे हे, त बिखरल इतिहास भी एक सूत्र में बंध जाए हे।

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