*कलम पर हमला: क्या अब सच लिखना भी अपराध है ?*
*कलम पर हमला: क्या अब सच लिखना भी अपराध है ?*
कौशांबी की यह घटना किसी एक पत्रकार या एक पुलिस अधिकारी तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता को उजागर करती है जिसमें कुछ लोग सत्ता के बल पर खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं।
एक पत्रकार को कुछ ही मिनटों में सैकड़ों गालियां देना, जान से मारने की धमकी देना और फिर हिरासत में लेकर मारपीट करना केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि कानून और संविधान का खुला अपमान है।
*जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं*
जिस पुलिस पर जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही पत्रकारों को धमकाए और पीटे, तो आम आदमी किससे न्याय की उम्मीद करेगा।
अगर सच लिखने वाला ही सुरक्षित नहीं है, तो समाज में सुरक्षा का दावा खोखला हो जाता है।
यह घटना बताती है कि
सवाल पूछना कुछ लोगों को असहज करता है
सच उजागर करना कई बार सत्ता को चुभता है
और जो झुकता नहीं, उसे डराने की कोशिश की जाती है
*यह सिर्फ एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं*
आज यह घटना संजय सिंह के साथ हुई है
कल यह किसी भी पत्रकार के साथ हो सकती है
अगर आज भी पत्रकार समाज खामोश रहा, तो आने वाले समय में सच लिखना और भी मुश्किल हो जाएगा
*पत्रकारों की एकजुटता ही सबसे बड़ा जवाब*
अब समय आ गया है कि हर पत्रकार, चाहे वह छोटे स्तर पर काम करता हो या बड़े मंच पर, एकजुट होकर खड़ा हो
इस घटना के खिलाफ संगठित और मजबूत विरोध जरूरी है
दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग होनी चाहिए
जब पत्रकार बंट जाते हैं तो सत्ता बेलगाम हो जाती है
और जब पत्रकार एकजुट होते हैं तो सबसे मजबूत व्यवस्था को भी जवाब देना पड़ता है
*प्रशासन के सामने सवाल*
क्या इस घटना पर केवल औपचारिक कार्रवाई होगी
क्या दोषियों को बचाने की कोशिश की जाएगी
या वास्तव में निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई होगी
अगर इस बार भी कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह संदेश जाएगा कि वर्दी के नाम पर सब कुछ किया जा सकता है
अब वक्त है आवाज उठाने का
यह समय चुप रहने का नहीं है
यह समय है अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़े होने का
हर पत्रकार को इस मुद्दे को उठाना होगा
हर मंच पर इसे लेकर आवाज बुलंद करनी होगी
और तब तक संघर्ष करना होगा जब तक न्याय नहीं मिल जाता
*अंतिम बात*
कलम को डराया नहीं जा सकता
सच को दबाया नहीं जा सकता
अगर कोशिश की जाएगी, तो वही कलम इतिहास लिखेगी और उसमें अत्याचार करने वालों का जिक्र जरूर होगा
अब फैसला पत्रकार समाज के हाथ में है
खामोशी या एकजुटता
*यह सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।*