परसुराम जयंती और अक्षय तृतीया का रहस्य
अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप ही ऐसा पावन पर्व है, जो जीवन में अक्षय (कभी न समाप्त होने वाले) शुभ फल प्रदान करता है।
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सनातन परंपरा में यह दिन अत्यंत शुभ और सिद्ध माना गया है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आने वाली यह तिथि बिना पंचांग देखे ही हर प्रकार के शुभ कार्यों के लिए उत्तम मानी जाती है। इस दिन किए गए जप, तप, दान और पुण्य का फल कई गुना बढ़कर मिलता है और जीवन में स्थायी सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
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दिव्य तिथि अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का अवतार हुआ, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। यही नहीं, महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन महाभारत की रचना का शुभारंभ किया था, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान समाहित है।
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इसलिए इस दिन गीता पाठ, विशेषकर 18वें अध्याय का अध्ययन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन ही मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, जिसे राजा भागीरथ की कठोर तपस्या का फल माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और आत्मा को शुद्धता प्राप्त होती है।
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इसके अतिरिक्त, माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य भी इसी दिन हुआ था, जिनकी कृपा से जीवन में अन्न और समृद्धि का कभी अभाव नहीं होता। उनकी पूजा से घर में सुख, शांति और तृप्ति बनी रहती है।
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अक्षय तृतीया का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है—दान और सेवा। इस दिन ब्राह्मणों को आदर सहित भोजन कराना, जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
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गृहस्थों को विशेष रूप से इस पुण्य कार्य में भाग लेना चाहिए।
सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ भी इसी तिथि से हुआ था, जिससे इसकी महिमा और भी बढ़ जाती है।
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इसी दिन भगवान बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं और वृंदावन में श्री बांके बिहारी जी के चरणों के दुर्लभ दर्शन वर्ष में केवल इसी अवसर पर होते हैं।
अतः इस पावन अवसर पर भगवान विष्णु की अक्षत, पुष्प और दीप से पूजा करें, सत्कर्म करें और अपने जीवन को शुभता और समृद्धि से भर दें।
आप सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं!
आचार्य डॉ अजय दीक्षित
मो.9559986789
नमन 🙏