"पहला पत्थर वही मारे, जिसने कभी कोई पाप न किया हो।
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक प्रसिद्ध कहावत सटीक बैठती है— "पहला पत्थर वही मारे, जिसने कभी कोई पाप न किया हो।" यह पंक्ति न केवल मानवीय स्वभाव का आईना है, बल्कि आज की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विरोधियों के बीच के अंतर को भी स्पष्ट करती है।
आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आलोचना का आधार शुचिता होनी चाहिए। नरेंद्र मोदी जी पर जितने भी 'पत्थर' उछाले गए, उन्होंने उन पत्थरों को देश की प्रगति के लिए मील का पत्थर बना दिया। जनता आज देख रही है कि कौन केवल उंगलियां उठा रहा है और कौन बिना थके राष्ट्र निर्माण में जुटा है।
जब तक विरोध करने वालों के अपने दामन साफ नहीं होते, तब तक उनके द्वारा फेंका गया हर पत्थर जनता की नजर में बेअसर साबित होता रहेगा।
राजनीति के मंच पर जब हम "पहला पत्थर" वाली बात करते हैं, तो यह सिद्धांत सत्ता पक्ष पर भी उतना ही लागू होता है जितना विपक्ष पर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हें उनकी इच्छाशक्ति और कड़े फैसलों के लिए जाना जाता है, वे भी अंततः एक इंसान हैं। एक विशाल और विविध देश का नेतृत्व करते समय कुछ फैसलों का गलत होना या उनके क्रियान्वयन में कमियां रहना स्वाभाविक है।
एक बड़े नेता की महानता इस बात में नहीं है कि वह कभी गलती न करे, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करे। "पहला पत्थर वही मारे" का सार यही है कि हम दूसरों की गलतियों को कोसने के बजाय इस बात को समझें कि बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के मार्ग में कुछ चूक होना संभव है।
नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल को केवल उनकी सफलताओं से नहीं, बल्कि उनकी चुनौतियों और चूकों से भी समझा जाना चाहिए। सत्ता में होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति सर्वज्ञ है। गलतियां यह साबित करती हैं कि प्रयास किए गए हैं। अंततः जनता यह तय करती है कि उन गलतियों के पीछे की नीयत क्या थी और क्या वे गलतियां उन बड़े बदलावों की तुलना में छोटी हैं जो देश ने पिछले वर्षों में देखे हैं।
भारतीय राजनीति में आलोचना लोकतंत्र का आधार रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति विरोध की शैली में एक बड़ा बदलाव आया है। अब यह विरोध केवल नीतियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक सुव्यवस्थित 'प्रोपेगेंडा' का रूप ले चुका है। जब विपक्ष यह देखता है कि वह चुनावी मैदान में मोदी जी की लोकप्रियता का मुकाबला नहीं कर पा रहा, तो वह अक्सर 'नैरेटिव सेट' करने या भ्रम फैलाने का रास्ता चुनता है।
"पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो" वाली बात यहाँ भी लागू होती है। जो दल खुद भ्रष्टाचार, आपातकाल और तुष्टिकरण के इतिहास से घिरे हैं, उनका मोदी जी पर नैतिकता का सवाल उठाना जनता को रास नहीं आता। प्रोपेगेंडा कुछ समय के लिए भ्रम तो पैदा कर सकता है, लेकिन वह 'काम की राजनीति' और 'ठोस नेतृत्व' का विकल्प नहीं बन सकता। जनता अब सोशल मीडिया के युग में तथ्यों को परखना जानती है, यही कारण है कि प्रोपेगेंडा के पत्थर अक्सर टकराकर वापस विपक्ष की ओर ही लौट जाते हैं।