logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

संपादकीय लेख का मंथन : "जो बंगाल जाता है, वही विद्रोही हो जाता है" ​ प्रसेनजीत दासगुप्त


​सल्तनत काल में बंगाल का नाम ही पड़ गया था 'बुलगाकपुर' अर्थात 'विद्रोहों का देश'। यहाँ के जल, हवा और मिट्टी में कुछ ऐसा है जो बागी होने के लिए उकसाता है। जो केंद्रीय शासन की मुट्ठी में कैद न रहकर पारे की तरह फैल जाना चाहता है। इतिहास की धारा कहती है कि अंग्रेजों के विरुद्ध पराधीन बंगाल ने जो वैचारिक प्रखरता दिखाई थी, या स्वतंत्रता के बाद दलीय राजनीति की धारा जिस तरह से यहाँ फैली है, वह समय के क्रमिक रूप में जितनी आकर्षक है, उतनी ही रोमांचक भी।

बंगाल का मामला ही कुछ अलग है। सारा देश, मान-चित्र, यहाँ तक कि भारत का भूगोल ही नहीं, समग्र रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के पन्ने भी ठीक इसी तरह 'देश' शब्द के साथ नहीं जुड़ते। उस समय के इतिहास को लिखने वालों ने भी 'बांग्लादेश' के भौगोलिक ढांचे को लेकर एक अलग धारणा व्यक्त की थी। उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र—इस देश का और कोई विकल्प नहीं था। पूर्व की ओर जहाँ पहाड़ियाँ, जलाशय, घने जंगल, गंगा-पद्मा-मेघना जैसी नदियाँ, समुद्र और हिमालय हैं, वहाँ राजसत्ता का प्रभाव कम ही पहुँच पाता था।

यह केवल भौगोलिक अलगाव नहीं था, बल्कि यहाँ के लोगों की मानसिकता और उनके भीतर छिपी राजनीतिक चेतना भी अलग थी। इतिहास के पन्नों में जो दर्ज है, वह अन्य प्रांतों की तुलना में बंगाल की स्वायत्तता और विद्रोह की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।

​जाति, संप्रभुता, अखंडता—इन शब्दों ने यहाँ के लोगों को बार-बार एकजुट किया। जब अंग्रेज यहाँ आए और उन्होंने अपनी संप्रभुता स्थापित करनी शुरू की, तब भी इस 'बुलगाकपुर' की गाथा ने उन्हें परेशान किया। इतिहास गवाह है कि यहाँ के लोगों ने कभी भी बाहरी शासन को आसानी से स्वीकार नहीं किया। मध्यकालीन सुल्तानों से लेकर आधुनिक काल के क्रांतिकारियों तक, बंगाल की मिट्टी ने हमेशा विद्रोह की फसल उगाई है।

​दिल्ली से लखनौती (प्राचीन बंगाल की राजधानी) की दूरी और यहाँ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने इसे हमेशा एक 'स्वतंत्र इकाई' बनाए रखा। यहाँ तक कि महान सुल्तानों के प्रतिनिधि भी जब यहाँ शासन करने आते थे, तो वे जल्द ही दिल्ली से नाता तोड़कर खुद को स्वतंत्र घोषित कर देते थे। इसीलिए दिल्ली के शासकों के लिए बंगाल हमेशा एक सिरदर्द बना रहा।
​'बुलगाकपुर' और विद्रोह का इतिहास
​लेख में विस्तार से बताया गया है कि कैसे गयासुद्दीन तुगलक से लेकर मुगल बादशाहों तक को बंगाल के विद्रोहों का सामना करना पड़ा। यहाँ की जलवायु, जिसे 'नर्क-ए-पुर-अज-नेमत' (नेमतों से भरा नर्क) भी कहा गया, बाहरी शासकों के लिए कठिन थी, लेकिन यहाँ के लोगों के लिए उनकी ताकत थी।

​मुख्य बिंदु:

दूरी और संचार: दिल्ली से बंगाल की अत्यधिक दूरी के कारण संदेश पहुँचने में महीनों लग जाते थे, जिससे विद्रोहियों को अपनी स्थिति मजबूत करने का समय मिल जाता था।

​प्रतिकूल प्रकृति: बंगाल की नदियाँ और मानसून विदेशी सेनाओं के लिए काल साबित होते थे।

आर्थिक संपन्नता: बंगाल की उपजाऊ भूमि और व्यापार ने इसे इतना समृद्ध बनाया था कि इसे दिल्ली के आर्थिक सहारे की जरूरत नहीं थी।

आधुनिक संदर्भ में बंगाल

​लेख केवल प्राचीन इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की ओर भी इशारा करता है। यह बंगाल की उस 'विद्रोही चेतना' की बात करता है जो आज भी यहाँ की राजनीति में झलकती है। चाहे वह केंद्र सरकार के साथ राज्य के संघर्ष हों या यहाँ की विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा, बंगाल आज भी अपनी उस पहचान को संजोए हुए है जहाँ वह किसी के सामने झुकना पसंद नहीं करता।

निष्कर्ष:

लेख का सार यही है कि बंगाल की भौगोलिक स्थिति, उसकी संस्कृति और इतिहास ने मिलकर एक ऐसी मानसिकता को जन्म दिया है जो अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए किसी भी बड़ी सत्ता से टकराने का साहस रखती है। इसीलिए कहा गया है— "जो बंगाल जाता है, वही विद्रोही हो जाता है।"

0
0 views

Comment