प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा: खुद को जिंदा साबित करने के लिए बुजुर्ग ने ओढ़ा कफन, डीएम दफ्तर में मचा हड़कंप
प्रदीप सिंह, महराजगंज
संतकबीरनगर/महराजगंज:
उत्तर प्रदेश के सरकारी सिस्टम की एक ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संतकबीरनगर के नाथनगर सीएचसी से रिटायर हुए एक सफाईकर्मी को राजस्व विभाग ने कागजों में 'मार' दिया और उनकी पुश्तैनी जमीन दूसरे के नाम कर दी। थक-हारकर पीड़ित बुजुर्ग आज खुद को जीवित साबित करने के लिए कफन पहनकर कलेक्ट्रेट पहुँच गया। क्या है पूरा मामला?
मामला इशहाक अली से जुड़ा है, जो नाथनगर सीएचसी में स्वीपर के पद पर तैनात थे। उन्होंने 31 दिसंबर 2019 को अपनी सेवा पूरी की और वर्तमान में वह बैंक से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। विडंबना देखिए कि एक विभाग (स्वास्थ्य विभाग) उन्हें जीवित मानकर पेंशन दे रहा है, जबकि दूसरे विभाग (राजस्व विभाग) ने 2 दिसंबर 2012 को ही उन्हें मृत घोषित कर दिया था।
जमीन हड़पने का गंभीर आरोप
इशहाक अली का आरोप है कि तत्कालीन राजस्व निरीक्षक ललित कुमार मिश्रा ने अपने पद का दुरुपयोग किया और उन्हें मृत दिखाकर उनकी0.770 हेक्टेयर पुश्तैनी कृषि जमीन (गाटा संख्या 892) गांव की ही एक महिला शाहिदुन्निशा के नाम हस्तांतरित कर दी।
सिस्टम की चौखट पर हारी उम्मीदें
पीड़ित के अनुसार, पिछले कई सालों से वह पेंशन दस्तावेज, सेवा रिकॉर्ड और अपने जीवित होने के तमाम सबूत लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ों और अफसरों की उदासीनता के आगे उनकी एक न सुनी गई। अंततः सिस्टम को जगाने के लिए उन्हें यह कठोर कदम उठाना पड़ा।
अधिकारियों में मची खलबली
कफन पहनकर जिलाधिकारी कार्यालय पहुँचे बुजुर्ग को देख अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। एडीएम सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले को संज्ञान में लिया है। प्रशासन ने अब इस मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है।मुख्य बिंदु:रिटायरमेंट:31 दिसंबर 2019 (सरकारी सेवा से) कागजी मृत्यु: 2 दिसंबर 2012 (राजस्व रिकॉर्ड में)
विवादित संपत्ति:0.770 हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन।
आरोप:तत्कालीन राजस्व निरीक्षक पर मिलीभगत का आरोप।
यह घटना दर्शाती है कि जब तक कोई व्यक्ति अतिवादी कदम न उठाए, तब तक फाइलें अपनी जगह से नहीं हिलतीं। अब देखना यह है कि जांच के बाद इशहाक अली को उनकी जमीन और 'जीवित' होने का अधिकार कब तक मिलता है।