इमोजी के दौर में खतों वाली मोहब्बत: क्या हमने एहसास खो दिए ?
"मोहब्बत तब भी मुक्कमल थी जब हाथ थामने में बरसों लग जाते थे,आज हाथ तो करीब है मगर रूहें स्क्रीन के पीछे कहीं खो गई है"
समय का पहिया जब घूमता है, तो सिर्फ तारीखें नहीं बदलतीं, बल्कि इंसान के महसूस करने का तरीका और उसकी रूह की गहराई भी बदल जाती है। अगर हम 90 के दशक के युवाओं और आज (2020s) के युवाओं की तुलना करें, तो यह सिर्फ दो पीढ़ियों का अंतर नहीं, बल्कि 'अहसास' और 'रफ्तार' के बीच का एक बड़ा संघर्ष है।
90 के दशक की सबसे बड़ी ताकत "धैर्य" था। उस दौर में अगर किसी से प्यार होता था, तो इजहार के लिए चिट्ठियों का सहारा लिया जाता था। किताबों के पन्ने प्रेम पत्र के गवाही हुआ करते थे । न्यू ईयर में ग्रीटिंग्स के जरिए प्रेम का संदेश के साथ चॉकलेट । लैंडलाइन की घंटी बजने पर दिल की धड़कनें तेज हो जाना और साइकिल पर दूर से एक झलक देखने के लिए घंटों खड़े रहना—यह सब भावनाओं को कच्चा (raw) लेकिन बेहद गहरा बनाता था। दोस्त भी सपोर्टिव होते थे ।
90's के आशिक़ी का वो गाना " तू मेरी जिंदगी है .... से लेकर आज " एक बोतल बोदका काम मेरा रोज का .... तक का सफर । वाकई कहा से कहा आ गए हम ।
"वो दौर ही कुछ अलग था , जब हम छत पर घंटों बस एक झलक का इंतजार करते थे , आज टाइपिंग देख कर धड़कने बढ़ती है, पर वो बात कान्हा जो खतों में महकती थी"
वहीं आज का दौर "इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन" (त्वरित संतुष्टि) का है। व्हाट्सएप के "ब्लू टिक" और डेटिंग ऐप्स के 'स्वाइप' ने इंतजार की तड़प को खत्म कर दिया है। आज जवाब मिलने में अगर 10 मिनट की देरी हो जाए, तो रिश्ता तनाव में आ जाता है।
जहाँ 90 के दशक में भावनाएं 'ठहरकर' जी जाती थीं, आज वे भागते हुए व्यक्त की जाती हैं।
90 के दशक में प्यार और दोस्ती "अनाउंस्ड" (घोषित) कम और "महसूस" ज्यादा की जाती थी। किसी को अपनी भावनाओं के बारे में बताना एक व्यक्तिगत और पवित्र अनुभव था। तब 'स्टेटस' दिल के अंदर होता था, सोशल मीडिया प्रोफाइल पर नहीं।
आज की भावनाएं अक्सर 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' की मोहताज हो गई हैं। हम साथ बिताए पलों का आनंद लेने से ज्यादा, उसे इंस्टाग्राम पर 'परफेक्ट' दिखाने की होड़ में रहते हैं। अपनत्व की जगह अब आकर्षण और 'वेल-क्यूरेटेड' इमेज ने ले ली है। दुःख की बात यह है कि आज की पीढ़ी हजारों फॉलोअर्स के बीच भी खुद को अकेला महसूस करती है, क्योंकि संवाद तो बढ़ गया है, लेकिन संपर्क (connection) खो गया है।
90 के दशक का बचपन और जवानी गलियों के क्रिकेट, कॉमिक्स की अदला-बदली और शाम को दोस्तों के साथ गप्पें मारने में बीतती थी। वहाँ तनाव के लिए जगह कम थी क्योंकि भावनाएं "फेस-टू-फेस" साझा होती थीं। दुःख होता था तो दोस्त कंधे पर हाथ रखते थे, इमोजी नहीं भेजते थे।
आज का युवा तकनीक की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। करियर की गलाकाट प्रतिस्पर्धा और सोशल मीडिया पर दूसरों की 'सफल' जिंदगी को देखकर पैदा होने वाली चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) आज के युवाओं के साये बन गए हैं। वे वर्चुअल दुनिया में तो सबके करीब हैं, लेकिन हकीकत में अपने पड़ोसियों तक से अनजान हैं।
मूल अंतर यह है कि 90 के दशक में भावनाएं "स्थायी" थीं। एक बार जो रिश्ता बना, वह उम्र भर की पूंजी बन जाता था। आज के दौर में भावनाएं 'ट्रेंड्स' की तरह बदलती हैं। सब कुछ इतनी तेजी से मिल रहा है कि उसकी कद्र कम हो गई है।
तकनीक ने हमें सुविधा तो दी है, लेकिन कहीं न कहीं हमारी भावनाओं की कोमलता छीन ली है। 90 के दशक के पास 'साधन' कम थे पर 'सुकून' ज्यादा था, आज 'साधन' असीमित हैं पर 'सुकून' की तलाश जारी है।
90 का दशक वह आखिरी दौर था जहाँ इंसान ने 'इंसान' बनकर जीना सीखा था, और आज का दौर वह है जहाँ इंसान 'मशीन' बनने की होड़ में है। हमें समझना होगा कि मशीनें सूचनाएं दे सकती हैं, लेकिन अहसास सिर्फ एक धड़कता हुआ दिल ही दे सकता है। आज के युवाओं को जरूरत है थोड़े 'ठहराव' की, ताकि वे भी जान सकें कि इंतजार में जो सुकून है, वह तुरंत पा लेने की होड़ में नहीं।
"चिट्ठियां अब नहीं आतीं, बस नोटिफिकेशन का शोर है,
दिल वहीं ठहरा है पुराना, बस ज़माना नया और कमज़ोर है।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT