वाह री राजनीति! खुद की जिम्मेदारी अधूरी, और दुनिया को न्याय सिखाने चले हैं 'नौटंकीबाज़'!
घर छोड़कर भागने वाले अब दूसरों की बहू-बेटियों के रक्षक बन रहे हैं। जनता के टैक्स के पैसों पर तमाशा बंद करो। जब आरक्षण पर सबकी सहमति थी, तो अमल क्यों नहीं हुआ? साफ़ है—इरादा महिलाओं को हक देना नहीं, सिर्फ वोट बटोरना है।