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यूपी की ‘मोस्ट वांटेड’ महिलाएं अब भी फरार: चुनाव से पहले बढ़ी सियासी हलचल, शाइस्ता-ज़ैनब-आयशा की तलाश पर उठे सवाल

रिपोर्ट: विवेक मिश्रा
उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति का पुराना रिश्ता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख अपनाने का दावा करने वाली सरकार के बीच माफिया अतीक अहमद के परिवार से जुड़ी तीन महिलाएं—शाइस्ता परवीन, ज़ैनब फात्मा और आयशा नूरी—अब भी फरार हैं। ये तीनों लंबे समय से उत्तर प्रदेश पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल हैं, लेकिन अब तक उनका कोई ठोस सुराग नहीं मिल सका है। जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इनकी फरारी को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
फरारी बनी चुनौती, एजेंसियां बेअसर?
प्रदेश की प्रमुख जांच एजेंसियां—उत्तर प्रदेश पुलिस, एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स), लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) और प्रवर्तन निदेशालय (ED)—इन तीनों महिलाओं की तलाश में लंबे समय से जुटी हुई हैं। हालांकि, तमाम छापेमारी, निगरानी और मुखबिर तंत्र के बावजूद अब तक कोई ठोस सफलता हाथ नहीं लगी है। यही वजह है कि इनकी फरारी अब प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
सूत्रों के मुताबिक, शुरुआत में इनकी तलाश के लिए कई जिलों में सघन अभियान चलाए गए, लेकिन समय के साथ यह अभियान धीमा पड़ता नजर आया। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कहीं न कहीं इनकी तलाश अब प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गई है।
चुनावी साल में बढ़ी सियासी सरगर्मी
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। ऐसे में माफिया अतीक अहमद का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। उनके परिवार से जुड़ी इन महिलाओं की फरारी को विपक्ष सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए एक बड़ा मुद्दा बना सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान यह मुद्दा और गरमा सकता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या चुनावी माहौल में ये महिलाएं खुद सामने आएंगी या फिर पुलिस इन्हें गिरफ्तार कर बड़ा एक्शन दिखाएगी। दोनों ही स्थितियां प्रदेश की राजनीति पर असर डाल सकती हैं।
‘बुलडोजर मॉडल’ पर भी उठे सवाल
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ ‘बुलडोजर मॉडल’ को एक सख्त कार्रवाई के प्रतीक के रूप में पेश किया है। कई बड़े माफियाओं की संपत्तियों पर कार्रवाई भी हुई है। लेकिन इन तीन महिलाओं की गिरफ्तारी न हो पाना इस मॉडल की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहा है।
विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार सच में माफियाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है, तो इतने समय बाद भी इन महिलाओं का फरार रहना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। वहीं, सत्ता पक्ष का दावा है कि कानून अपना काम कर रहा है और जल्द ही इनका पता लगा लिया जाएगा।
गुमनामी में कैसे रह रहीं ये महिलाएं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ये तीनों महिलाएं कहां छिपी हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इनके पास मजबूत नेटवर्क और संसाधन हो सकते हैं, जो इन्हें लगातार लोकेशन बदलने में मदद कर रहे हैं। यह भी आशंका जताई जा रही है कि ये महिलाएं राज्य से बाहर या देश के किसी दूसरे हिस्से में भी छिपी हो सकती हैं।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि फरारी के दौरान इन महिलाओं ने अपनी पहचान बदल ली हो सकती है, जिससे इन्हें पकड़ पाना और मुश्किल हो गया है। हालांकि, इस तरह की जानकारियों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस की रणनीति पर उठ रहे सवाल
लंबे समय से गिरफ्तारी न होने के कारण पुलिस की रणनीति पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी आरोपी को पकड़ने में इतना समय लग रहा है, तो जांच और इंटेलिजेंस सिस्टम में कहीं न कहीं कमी जरूर है।
हालांकि, पुलिस अधिकारी इस बात से इनकार करते हैं। उनका कहना है कि फरार अपराधियों को पकड़ना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर जब उनके पास मजबूत नेटवर्क हो। अधिकारियों का दावा है कि लगातार प्रयास जारी हैं और सही समय पर कार्रवाई की जाएगी।
क्या चुनाव से पहले होगा बड़ा खुलासा?
प्रदेश में यह चर्चा जोरों पर है कि चुनाव से पहले इन तीनों महिलाओं को लेकर कोई बड़ा घटनाक्रम सामने आ सकता है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि या तो ये महिलाएं खुद सामने आ सकती हैं या फिर पुलिस इन्हें गिरफ्तार कर चुनावी माहौल में बड़ा संदेश देने की कोशिश करेगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर चुनावी माहौल पर पड़ेगा। सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है, वहीं विपक्ष इसे देर से उठाया गया कदम बताकर सवाल खड़े करेगा।
जनता के बीच क्या है संदेश?
प्रदेश की आम जनता के बीच इस पूरे मामले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग सरकार की सख्ती की सराहना कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जब छोटे अपराधियों को तुरंत पकड़ लिया जाता है, तो बड़े नामों से जुड़े लोगों को पकड़ने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति और कानून-व्यवस्था के बीच माफिया अतीक अहमद परिवार से जुड़ी इन तीन महिलाओं की फरारी एक बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चुनाव से पहले शाइस्ता परवीन, ज़ैनब फात्मा और आयशा नूरी सामने आएंगी, या फिर उत्तर प्रदेश पुलिस इन्हें पकड़कर बड़ा संदेश देगी? जवाब आने वाला समय ही देगा, लेकिन फिलहाल यह मामला प्रदेश की सियासत और सुरक्षा व्यवस्था दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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