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*पसगवां का शैक्षिक वनवास: सुनहरे वादों के बीच सिसकता बचपन*

*पसगवां का शैक्षिक वनवास: सुनहरे वादों के बीच सिसकता बचपन*

*लेखक उपेंद्रनाथ पाण्डेय की कलम से*

“जब कलम पकड़ने वाले हाथों को दूर तक स्कूल नहीं मिलता, तो वह हाथ अक्सर व्यवस्था के खिलाफ मुट्ठियां तान लेते हैं।”
लखीमपुर खीरी जनपद की 144 मोहम्मदी विधानसभा का विकास खंड पसगवां आज विकास की उस विडंबना का शिकार है, जहाँ फाइलें तो तरक्की की गवाही देती हैं, लेकिन धरातल पर सिर्फ सन्नाटा और टूटी हुई दीवारें हैं। किसी भी क्षेत्र की प्रगति का पैमाना वहां की सड़कों या होर्डिंग्स से नहीं, बल्कि वहां की शिक्षा व्यवस्था से मापा जाता है। लेकिन पसगवां में शिक्षा की रीढ़ न केवल झुकी हुई है, बल्कि उपेक्षा के बोझ तले दम तोड़ रही है।
1. वादों का मायाजाल और जमीनी रेगिस्तान
पसगवां ब्लॉक मुख्यालय होने के नाते एक बड़ी जिम्मेदारी वहन करता है, लेकिन यहाँ की शैक्षिक तस्वीर किसी "खंडहर" से कम नहीं है। एक प्राथमिक विद्यालय और एक जूनियर स्कूल के भरोसे हजारों बच्चों का भविष्य टिका दिया गया है। सवाल यह है कि क्या कक्षा 8 तक की शिक्षा एक नागरिक को आधुनिक युग की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकती है? क्या पसगवां के बच्चों के सपनों की उड़ान को आठवीं कक्षा की दहलीज पर ही दम तोड़ देना चाहिए?
2. 'आधी आबादी' का पूरा अपमान: कहाँ जाएं बेटियां?
सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह है कि इतने बड़े क्षेत्र में छात्राओं के लिए एक भी स्वतंत्र इंटर कॉलेज नहीं है। एक तरफ 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारे गूँजते हैं, वहीं दूसरी ओर पसगवां की बेटियां उच्च शिक्षा के लिए असुरक्षित रास्तों और मीलों लंबी दूरियों को तय करने पर मजबूर हैं। बिना इंटर कॉलेज के, ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकांश मेधावी बेटियां कक्षा 10 के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ने पर विवश हो जाती हैं। क्या यह उन बेटियों के पंख कतरने जैसा नहीं है?
3. घोषणाओं के "कबूतर" और हकीकत की "धूल"
2014 का अधूरा वादा: दस साल पहले जनता को एक इंटर कॉलेज का सपना दिखाया गया था। एक दशक बीत गया, सरकारें बदलीं, प्रतिनिधि बदले, लेकिन वह वादा आज भी भाषणों की फाइलों में ही कैद है।
केंद्रीय विद्यालय का रहस्य: एक समय शोर मचा कि पसगवां को 'केंद्रीय विद्यालय' की सौगात मिलने वाली है। अभिभावकों ने राहत की सांस ली थी, बच्चों की आँखों में चमक आई थी। लेकिन वह योजना कहाँ विलीन हो गई, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। क्या वह केवल एक चुनावी शिगूफा था?
4. विरासत बनाम वर्तमान: विकास या विनाश?
लेख का एक कड़वा सच यह भी है कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया था, वर्तमान व्यवस्था उसमें 10% का इजाफा करने में भी नाकाम रही है। विकास का अर्थ होता है—जो है उसे बेहतर बनाना और जो नहीं है उसे जोड़ना। लेकिन यहाँ तो स्थिति यह है कि जो पुराना है वह भी जर्जर हो रहा है और नया सिर्फ "सोशल मीडिया के पोस्टर्स" में चमक रहा है।
5. क्या यह एक सोची-समझी साजिश है?
कहा जाता है कि यदि किसी समाज को गुलाम बनाए रखना हो, तो उसकी शिक्षा छीन लो। क्या पसगवां को जानबूझकर अशिक्षा के अंधेरे में रखा जा रहा है? ताकि यहाँ की आने वाली पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति सजग न हो सके? ताकि वे कभी व्यवस्था से तीखे सवाल न पूछ सकें?
निष्कर्ष: सत्ता को एक खुली चेतावनी
शिक्षा की यह बदहाली सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि “जब बच्चों का भविष्य अंधेरे में होता है, तो सत्ता का उजाला भी ज्यादा दिन नहीं टिकता।”
पसगवां के युवा अब जाग रहे हैं। भारतीय किसान संघ के माध्यम से उठने वाली यह आवाज अब थमने वाली नहीं है। यह लेख केवल आलोचना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को आईना दिखाना है जिसने पसगवां के भविष्य को 'पोस्टर वाले विकास' की भेंट चढ़ा दिया है।
वक्त आ गया है कि वादों की पोटली खोली जाए और धरातल पर ईंट-गारा रखा जाए, वरना आने वाला इतिहास इस उपेक्षा के लिए वर्तमान नेतृत्व को कभी माफ नहीं करेगा।
"शिक्षित पसगवां - सशक्त पसगवां"
उपेन्द्र पाण्डेय
जिलामंत्री, भारतीय किसान संघ, लखीमपुर खीरी

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
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*Delhi Crime Press*
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