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कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनी : पहाड़ काटकर बेच दिया ! प्लाट

• प्लाटिंग के लिए डबरौहा की भूमि में भूमाफियाओं ने खड़ा किया हकदार

• सवालों के घेरे में तत्कालीन तहसीलदार से लेकर आरआई और पटवारी के कार्य

उमरिया। जिले से सटे गांव डबरौहा से बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि जमीन से जुड़े कानूनों की खुलेआम अनदेखी की तस्वीर भी उजागर कर दी है। यहां कृषि भूमि को अवैध रूप से प्लाटिंग कर बेचे जाने का आरोप है, और इस पूरे मामले में एक सुनियोजित नेटवर्क के सक्रिय होने की बात कही जा रही है। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण का मुख्य चेहरा लखनूद मोहम्मद, इस्लाम मोहम्मद और मोले सिंह है। आदिवासी मोले सिंह भू-माफियाओं का मोहरा है। लखनूद और इस्लाम ने पहले अपने नाम पर कृषि भूमि खरीदी और उसके बाद उसे छोटे-छोटे प्लॉट्स में काटकर बेचने का काम शुरू कर दिया। वहीं कार्य आदिवासी मोले सिंह के नाम पर किया गया। यह सब कथित तौर पर कुछ स्थानीय बड़े भू-माफियाओं के साथ मिलकर किया गया है।

रिकार्ड कह रहे दूसरी कहानी

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन खसरों की जमीनों में यह प्लाटिंग की जा रही है, उनके पुराने राजस्व रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। इन रिकॉर्ड्स में कथित रूप से हेरफेर कर जमीन की प्रकृति और स्थिति बदल दी गई। प्रशासनिक मिलीभगत के साथ भू-माफियाओं के द्वारा किए गए जमीन के इस खेल का दायरा केवल कागजी हेरफेर तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक संरचना के साथ भी खिलवाड़ किया गया है।

पर्यावरण की उड़ी धज्जियां

डबरौहा अंतर्गत प्लाटिंग में कछरवार मार्ग की ओर स्थित पहाड़ी को काटकर उसे समतल जमीन में तब्दील कर दिया गया, ताकि वहां प्लाटिंग की जा सके। यह न सिर्फ पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सीधे तौर पर खनिज विभाग और राजस्व विभाग की अनुमति के बिना किया गया कार्य अवैध उत्खनन और भौगोलिक संरचना को बर्बाद करने की श्रेणी में आता है। सूत्रों की माने तो इस तरह की खुदाई के लिए खनिज विभाग उमरिया से कोई वैध अनुमति नहीं ली गई, और न ही कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने की प्रक्रिया का पालन किया गया। इसके बावजूद, खुलेआम प्लॉट काटकर बेचे जा रहे हैं, और खरीददारों को भविष्य के सपने दिखाए जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि आम लोगों के साथ संभावित धोखाधड़ी की आशंका भी पैदा करती है।

नोटिस तक सीमित कार्यवाही

साप्ताहिक समाचार पत्र दबंग क्रांति ने इस पूरे मामले को लेकर पिछले अंकों में समाचार प्रकाशित किया है। सूत्रों की माने तो 14 लोगों को डबरौहा में अवैध प्लाटिंग से संबंधित मामले को लेकर नोटिस भी जारी की गई और पन्द्रह दिवस के अंदर स्पष्टीकरण मांगा गया था। लेकिन फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में कैद है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठ रहे सवाल 

जब इतने बड़े स्तर पर भूमि का स्वरूप बदला जा रहा था, पहाड़ी काटी जा रही थी और प्लॉटिंग का काम चल रहा था, तब स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे थे ? जबकि भूमि के क्रय-विक्रय में तत्कालीन तहसीलदार, आर.आई. और पटवारी की भूमिका सवालों के घेरे में है, जिन्होंने कलेक्टर के बिना अनुमति पूरा कारनामा भू-माफियाओं के पक्ष में कर दिया। कानून के जानकारों की मानें तो कृषि भूमि को प्लाटिंग कर बेचने के लिए कई स्तरों की अनुमति आवश्यक होती है, जिसमें भूमि उपयोग परिवर्तन, नगर एवं ग्राम निवेश की स्वीकृति, और अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं शामिल हैं। यदि इनका पालन नहीं किया गया है, तो यह सीधे तौर पर अवैध गतिविधि की श्रेणी में आता है और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

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