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"नारी सम्मान की दौड़ — गंगा किनारे संकल्प, लेकिन असली मंजिल अभी दूर है" पटना के गंगा घाट पर 'फन रन' ,




विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार,

पटना के रेलवे ब्रिज — गंगा घाट पर "फन रन" का आयोजन एक सुखद और सार्थक दृश्य था। मातृशक्ति की अपार उपस्थिति, गंगा की लहरों के साथ स्वस्थ जीवन का संकल्प — यह बिहार की नारी चेतना की जीवंत तस्वीर थी। इस आयोजन का स्वागत होना चाहिए।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 27 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति हस्ताक्षर के बाद अधिनियमित हो गया — लेकिन यह उस तारीख से लागू होगा जो केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निर्धारित करेगी।

केंद्र सरकार द्वारा 16 से 18 अप्रैल 2026 में विशेष सत्र का आयोजन किया जा रहा है — जिसका उद्देश्य इस अधिनियम को 2029 के चुनावों से पहले पूरी तरह लागू करना है।

यानी — 33% आरक्षण का वादा पूरा नहीं हुआ है, प्रक्रिया जारी है। इसे "दे दिया" कहना जनता को भ्रमित करना होगा।

नीतीश जी का योगदान — और उनकी विदाई का प्रश्न
आदरणीय नीतीश कुमार जी — "आधी आबादी को पूरा हक दिया।" यह सही है।

बिहार पंचायती राज में 50% महिला आरक्षण नीतीश जी की ऐतिहासिक देन है। इससे लाखों महिलाएं नेतृत्व में आईं।
लेकिन जब इस "फन रन" का आयोजन हो रहा था, उसी दिन — 15 अप्रैल 2026 — नीतीश कुमार बिहार की राजनीति से विदा हो रहे थे। 21 साल के मुख्यमंत्रित्व का अंत।

क्या यह उचित नहीं होता कि नारी सम्मान के इस मंच से उनके इस योगदान को केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उचित और ईमानदार श्रेय दिया जाता?

गंगा घाट से असली सवाल
गंगा के किनारे दौड़ना प्रेरणादायक है — लेकिन जब तक बिहार की महिलाएं इन सवालों से नहीं दौड़तीं, तब तक हर "फन रन" अधूरा है:

बिहार में महिला साक्षरता दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से नीचे — कब तक?

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के वर्षों बाद भी गया-औरंगाबाद के गांवों में बालिका विद्यालय बंद पड़े हैं — जिम्मेदार कौन?

33% राजनीतिक आरक्षण 2029 में मिलेगा — लेकिन आर्थिक और सामाजिक आरक्षण कब?

पंचायतों में "सरपंच पति" की परंपरा अभी भी जीवित है — "हक" केवल कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर चाहिए।

निष्कर्ष:
गंगा घाट पर उठे कदम सराहनीय हैं। नारी सम्मान का संकल्प स्वागतयोग्य है।
लेकिन संकल्प तब सार्थक होता है जब वह नारे से नीति बने, मंच से मैदान बने, और दावे से धरातल बने।

जब बिहार की हर बेटी स्कूल में पढ़े, हर बहन सुरक्षित घर लौटे, हर माँ को सरकारी अस्पताल में इलाज मिले — तभी गंगा घाट की यह दौड़ अपनी मंजिल पाएगी।

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