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छतरपुर में केन-बेतवा आंदोलन का 10वां दिन: आदिवासियों ने उठाई न्याय की मांग, विस्थापन के खिलाफ बढ़ा विरोध

छतरपुर (मध्य प्रदेश) में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में चल रहा आंदोलन आज अपने 10वें दिन में प्रवेश कर गया है। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हैं, जो अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने की मांग को लेकर लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के नाम पर उन्हें उनके पुश्तैनी गांवों और संसाधनों से बेदखल किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह परियोजना उनके अस्तित्व और संस्कृति के लिए गंभीर खतरा बन गई है। आंदोलनकारियों ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस ‘स्वर्ण युग’ की बात की जा रही है, वह आदिवासियों के लिए ‘विस्थापन युग’ साबित हो रहा है।

धरना स्थल पर मौजूद लोगों ने स्पष्ट कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास नहीं चाहिए जो उनकी जमीन, पहचान और आजीविका छीन ले। उनका कहना है कि बिना उचित पुनर्वास और सहमति के इस तरह की परियोजनाएं थोपना अन्याय है।

आंदोलनकारियों ने मांग की है कि:

केन-बेतवा लिंक परियोजना पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए

प्रभावित आदिवासी परिवारों की सहमति ली जाए

उचित मुआवजा और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जाए


स्थानीय प्रशासन ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है और लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की है। वहीं, अभी तक सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है, यह मामला अब राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी आंदोलन का समर्थन करना शुरू कर दिया है।

अब देखना होगा कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद कब स्थापित होता है और इस मुद्दे का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल, छतरपुर में आदिवासियों की यह लड़ाई ‘न्याय बनाम विकास’ की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा कर रही है।

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