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“सत्ता का नशा या कानून का मज़ाक? मध्यप्रदेश में बेलगाम होते जनप्रतिनिधि और उनका ‘प्रभावशाली’ परिवार”


✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
मध्यप्रदेश में कानून व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिवपुरी से सामने आई यह घटना केवल एक सड़क हादसा नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग और कानून के खुले उल्लंघन का जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है। जब एक विधायक का पुत्र खुलेआम लोगों पर थार चढ़ा देता है, और फिर पुलिस के सामने यह कहता है कि “बाप विधायक है, मर्डर भी निपटा लेंगे”, तो यह केवल एक बयान नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।
यह घटना साफ संकेत देती है कि क्या प्रदेश में कुछ लोगों के लिए कानून सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है? क्या सत्ता से जुड़े लोग अब खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शुरुआती स्तर पर पुलिस की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में रही। पहले अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज करना और बाद में मीडिया दबाव के बाद नाम जोड़ना—यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम दबाव में काम कर रहा है। अगर मीडिया हस्तक्षेप न करता, तो क्या यह मामला भी दबा दिया जाता?
प्रदेश की मौजूदा सरकार, जो खुद को सुशासन और कानून के राज की बात करती है, उसे इस घटना पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्या यही है “डबल इंजन सरकार” का मॉडल, जहां आम नागरिक की जान सस्ती और सत्ता से जुड़े लोगों की गलती महंगी नहीं होती?
यह घटना केवल एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की मानसिकता को उजागर करती है—जहां प्रभाव और पद, न्याय से बड़ा हो गया है।
जरूरत है सख्त कार्रवाई की, न कि लीपापोती की।
यदि ऐसे मामलों में उदाहरण पेश नहीं किए गए, तो यह संदेश जाएगा कि सत्ता का संरक्षण अपराध के लिए कवच बन चुका है।
मध्यप्रदेश में कानून का डर खत्म हो रहा है या खत्म कर दिया गया है—यह सवाल अब जनता के बीच गूंज रहा है। जवाब सरकार को देना होगा, और जवाबदेही भी तय करनी होगी।

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